कैमूर के सिसवार में मिला पालकालीन बौद्ध विहार का सुराग, तालाब खुदाई में निकली प्राचीन दीवार

कैमूर जिले के सिसवार गांव में एक लघु सिंचाई योजना के तहत तालाब की खुदाई के दौरान एक पांच फीट चौड़ी प्राचीन दीवार मिली है. स्थानीय लोगों का दावा है कि यह पाल वंश के काल के अवशेष हो सकते हैं, जो एक प्राचीन बौद्ध विहार का संकेत देते हैं. ग्रामीणों ने वैज्ञानिक उत्खनन और संरक्षण की मांग की है.

Kaimur News : कैमूर जिले के रामपुर प्रखंड के सिसवार गांव में लघु सिंचाई योजना के तहत तालाब की खुदाई के दौरान एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक संरचना सामने आई है. खुदाई में करीब पांच फीट चौड़ी प्राचीन दीवार मिली है, जो लगभग तीन एकड़ क्षेत्र में फैली बताई जा रही है. स्थानीय लोगों का दावा है कि यह अवशेष पाल वंश के काल के हैं. इतिहासकारों का भी मानना है कि यदि यहां वैज्ञानिक उत्खनन कराया जाए तो एक प्राचीन बौद्ध विहार के महत्वपूर्ण साक्ष्य मिल सकते हैं.

20 साल पहले भी मिली थीं हजारों प्राचीन ईंटें

बेलाव गांव के डॉ. मृत्युंजय सिंह मौर्य की सूचना पर प्रभात खबर की टीम ने मौके पर पहुंचकर ग्रामीणों से जानकारी ली. गांव के बुजुर्ग देनी राम (70), मोतीलाल राम (65), राजमुनी राम और महेंद्र सिंह ने बताया कि करीब 20 वर्ष पहले इसी तालाब की खुदाई में हजारों प्राचीन ईंटें निकली थीं. उस समय ग्रामीण उन ईंटों को अपने घरों के निर्माण में इस्तेमाल कर ले गए थे. इस बार खुदाई में फिर से प्राचीन दीवार का हिस्सा सामने आया है.

बोधिसत्व प्रतिमा और वोटिव स्तूप पहले भी मिल चुके हैं

ग्रामीणों के अनुसार, इसी क्षेत्र से पूर्व में बोधिसत्व की एक प्रतिमा और एक स्तूप भी मिला था. गांव के लोग जिस प्रतिमा की पूजा "चतुर्भुज बाबा" के रूप में करते हैं, विशेषज्ञ उसे बोधिसत्व की प्रतिमा मानते हैं. करीब तीन फीट लंबी प्रतिमा में मुख्य भाग में बुद्ध की आकृति और दोनों ओर सिंह की आकृतियां बनी हैं, हालांकि प्रतिमा का चेहरा क्षतिग्रस्त है. इसके पास स्थित स्तूप को ग्रामीण शिवलिंग मानकर पूजा करते हैं.

इतिहासकार ने पालकालीन धरोहर होने की जताई संभावना

एसपी जैन कॉलेज के भाषा वैज्ञानिक एवं इतिहासकार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने प्रतिमा और ईंटों की तस्वीरों का अध्ययन करने के बाद बताया कि यह संरचना वोटिव स्तूप (मनौती स्तूप) प्रतीत होती है. उन्होंने कहा कि इसकी अष्टकोणीय संरचना बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का प्रतीक है. ग्रामीण जिस ईंट को "गदहिया ईंट" कहते हैं, वह वास्तव में पालकालीन ईंट है, जिसकी बनावट सुजाता स्तूप में प्रयुक्त ईंटों से मिलती-जुलती है.

वैज्ञानिक उत्खनन से खुल सकते हैं कई ऐतिहासिक राज

डॉ. सिंह का कहना है कि यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण या संबंधित विभाग यहां वैज्ञानिक तरीके से खुदाई कराए, तो प्राचीन ईंटों की दीवार के साथ बौद्ध भिक्षुओं के आवासीय कक्ष और अन्य ऐतिहासिक संरचनाएं भी मिल सकती हैं. उनके अनुसार उपलब्ध साक्ष्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि सिसवार गांव कभी एक महत्वपूर्ण बौद्ध विहार रहा होगा.

अब तक नहीं पहुंची पुरातत्व विभाग की टीम

ग्रामीणों का कहना है कि गांव के कई घरों के बाहर आज भी प्राचीन ईंटों के टुकड़े मौजूद हैं, लेकिन इतनी महत्वपूर्ण खोज के बावजूद अब तक पुरातत्व विभाग की कोई टीम मौके पर नहीं पहुंची है. लोगों ने सरकार से मांग की है कि सिसवार के बड़का तालाब क्षेत्र को संरक्षित घोषित कर वैज्ञानिक उत्खनन कराया जाए और इसे पर्यटन एवं ऐतिहासिक विरासत स्थल के रूप में विकसित किया जाए.


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By Raju kumar

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