आरक्षण व्यवस्था : महिला जनप्रतिनिधि बनीं मुखौटा

आधी आबादी अब भी पति व रिश्तेदारों के भरोसे 50 प्रतिशत आरक्षण मात्र छलावा भभुआ सदर : वैसे तो बिहार सरकार ने वर्ष 2006 में भी आधी आबादी को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के तहत 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उनके सशक्तीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया था. लेकिन, सरकार द्वारा दिये गये इस आरक्षण […]

आधी आबादी अब भी पति व रिश्तेदारों के भरोसे
50 प्रतिशत आरक्षण मात्र छलावा
भभुआ सदर : वैसे तो बिहार सरकार ने वर्ष 2006 में भी आधी आबादी को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के तहत 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उनके सशक्तीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया था. लेकिन, सरकार द्वारा दिये गये इस आरक्षण का लाभ आज भी आधी आबादी को नहीं मिल पा रहा है. महिलाओं को पंचायत चुनाव में आरक्षण दिये एक दशक से ज्यादा हो चुका है. इस एक दशक बीतने के बावजूद अब भी पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं हुआ है. आज भी हमारा समाज जनता से जुड़ा मुद्दा हो या फिर सरकारी गतिविधि हर जगह पुरुष प्रधान का ही वर्चस्व है.
भले ही आरक्षण के बदौलत आधी आबादी पंचायत से लेकर जिलास्तर व नगर निकाय के सरकार में आ गयी हो. लेकिन, उनके निर्णय पर आज भी पुरुषों की पहरेदारी होती है. खासकर निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि के रिश्तेदार या फिर उनके पति का ही जोर चलता है.
स्थानीय शासन प्रशासन भी अघोषित रूप से इसका समर्थन कर रहे है. अगर यही स्थिति रही तो राज्य सरकार के महिला सशक्तीकरण के दावे की हवा निकल जायेगी.
पुरुष करें महिला जनप्रतिनिधियों को जागरूक : 50 प्रतिशत आरक्षण के बावजूद महिला जनप्रतिनिधियों में निर्णय लेने की अक्षमता पर जिला पदाधिकारी राजेश्वर प्रसाद सिंह ने कहा कि पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद उनके नेतृत्व क्षमता में विकास हुआ है. कई महिला जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में अच्छा काम कर रही है. अगर कहीं महिला जनप्रतिनिधि के स्थान पर उनके रिश्तेदार या पति काम को निबटाते हैं, तो गलत है. उन्हें भी चाहिए कि महिलाओं के नेतृत्व को आगे बढ़ायें. प्रशासन को भी इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि महिला जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्रों में विकास की बात करें.

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