कैसे पढ़ेंगे हमारे बच्चे, जब नहीं मिल रहीं किताबें

डिमांड 3,56,246 किताबों की, मिलीं सिर्फ 1,54,257 किताबें वर्ग एक से आठवीं तक के बच्चों तक नहीं पहुंची पाठ्य सामग्री भभुआ (नगर) : इसे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कहा जाये या शिक्षा के अधिकार कानून का उल्लंघन. शिक्षा के नाम पर बेतहाशा खर्च, व्यवस्था सुधारने को बनने वाली रणनीतियां, बैठक व दिशा निर्देश […]

डिमांड 3,56,246 किताबों की, मिलीं सिर्फ 1,54,257 किताबें

वर्ग एक से आठवीं तक के बच्चों तक नहीं पहुंची पाठ्य सामग्री
भभुआ (नगर) : इसे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कहा जाये या शिक्षा के अधिकार कानून का उल्लंघन. शिक्षा के नाम पर बेतहाशा खर्च, व्यवस्था सुधारने को बनने वाली रणनीतियां, बैठक व दिशा निर्देश का दौर शिक्षा में गुणवत्ता की बात, विद्यालय का निरीक्षण, शिक्षक व बच्चों पर ध्यान इन सब का मतलब उस समय बेमानी हो जाता है, जब बच्चे विद्यालय में किताब के लिए विवश दिखते हैं. वर्ग एक से लेकर आठ तक के बच्चों की किताबों की कमी हर साल की कहानी है. इसके बावजूद इस पर शासन-प्रशासन या विभाग का ध्यान नहीं जाता है.
अब प्रश्न उठता है कि बच्चों के किताबों का पैसा जब जिले के बजट से ही कटता है, तो फिर विभाग इस पर संज्ञान क्यों नहीं लेता. गौरतलब है कि सेशन प्रारंभ हुए आधा समय बीत गया, लेकिन अभी भी पूरी तरह से बच्चों के हाथों में किताबें नहीं पहुंची.
निदेशालय का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेते हैं अधिकारी: जिले के अधिकारी इस मामले में निदेशालय का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन देखा जाये तो बच्चों की शिक्षा के अधिकार कानून के अंतर्गत उनकी भी यह जिम्मेवारी बनती है कि बच्चों के शिक्षा के अधिकार का हनन न हो, लेकिन जिले के अधिकारी करें भी तो क्या करें,
वे कहते हैं रिमाइंडर भेजा गया है. विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, नये सत्र 2016- 17 के लिए वर्ग एक से लेकर आठ तक के बच्चों के लिए 356246 पुस्तकों की डिमांड की गयी थी, लेकिन मात्र 154257 ही किताबें प्राप्त हुईं. गौर करने वालीबात यह है कि इसमें भी वर्ग एक, दो और आठ की एक भी किताब अभी तक उपलब्ध नहीं हो सकी है. इस स्थिति से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्कूलों में शिक्षक बच्चों को कैसे पढ़ाते होंगे और बच्चे कितना सीख पाते होंगे.
किताब मंगाने की प्रक्रिया
जानकारी के अनुसार किताब के लिए जिले से निदेशालय को डिमांड भेजा जाता है. डिमांड के आधार पर उनके बजट से राज्य शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा पैसा काट लिया जाता है, फिर वह पैसा बिहार राज्य पाठ्य पुस्तक निगम को दिया जाता है. इसके आलोक में निगम द्वारा जिले में पुस्तकों की आपूर्ति की जाती है.
हर साल 70 फीसदी किताबों की नहीं होती है आपूर्ति
सूत्रों की माने तो किताबों की यह समस्या नयी नहीं है. आधा सत्र तक डिमांड के विपरीत आधी से भी कम किताबें आती हैं. उसके बाद सत्र समापन के पहले तक धीरे-धीरे किताबों की आपूर्ति होती है और अंतत: हर साल 70 फीसदी से अधिक किताबों की आपूर्ति नहीं की जाती है.

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