समस्या. अस्पताल परिसर में एक्सरे और अल्ट्रासाउंड की नहीं है व्यवस्था
ब्रिटिश काल से घोड़ा अस्पताल के नाम से प्रसिद्ध जिले का पशु अस्पताल में दवाओं की किल्लत है. कभी यहां घोड़ों का इलाज किया जाता था तमाम सुविधाओं का तामझाम था. लेकिन आज यही अस्पताल अपनी व्यवस्था के हाल पर आठ-आठ आंसू बहाने को मजबूर है.
दम तोड़ रहा जिले का पशु अस्पताल
जहानाबाद नगर : अंगरेजों के जमाने में घोड़े के इलाज के लिए जाना जाता था जहानाबाद का पशु चिकित्सालय, आज यहां दवा की कमी से पशुपालकों को परेशानी झेलनी पड़ती है. इसके कायाकल्प के लिए वर्ष 2011 में जर्जर भवन से निकाल कर नवनिर्मित भवन में शिफ्ट कराया गया था.
बेहतर चिकित्सा व्यवस्था के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं भी अस्पताल परिसर में मुहैया करायी गयी थी. लेकिन कुव्यवस्था के कारण हर तरह की सुविधा होते हुए भी दवा के अभाव में यहां पशु का इलाज नहीं हो पा रहा है. गौरतलब है कि जिले में पशु अस्पतालों की संख्या करीब 17 है.
हर अस्पताल में एक डाॅक्टर ,एक नाइट गार्ड, एक आदेशपाल एवं एक पशुधन सहायक की तैनाती है. जहानाबाद का अस्पताल चूंकि जिला अस्पताल है, इसलिए यहां की व्यवस्थाएं अन्य अस्पतालों की अपेक्षा थोड़ी बेहतर है. यहां लैब की सुविधा भी है. जां स्टूल टेस्ट के अलावा खून व पेशाब की जांच भी की जाती है. जाड़े और गरमी के मौसम में वैक्सीन की भी व्यवस्था है. यहां एंबुलेंस की सुविधा भी उपलब्ध है. लेकिन अस्पताल परिसर में एक्सरे और अल्ट्रासाउंड की व्यवस्था नहीं है. जानवरों को यहां डायरिया फीवर रिपीटल ब्रीडर समेत अन्य तरह के रोगों का इलाज किया जाता है.
बघमा और गलफुल्ली आदि बीमारियों के लिए बैक्सीन भी मुहैया करायी जाती है. शिविर लगा कर एंटी रैबीज का इंजेक्शन भी दिया जाता है. लेकिन जब दवा ही उपलब्ध न है तो तमाम सुविधाएं प्रभावित हो जाती है. हालांकि सीमेन को स्टोर करने के लिए नाइट्रोजन गैस की भी व्यवस्था है. जहां पटना के बीएलडी सेंटर से गायों के अलग-अलग नस्ल के सीमेन लाये जाते है और मांग के हिसाब से सीमेन देने का भी प्रावधान है. हालांकि पशुपालकों की मानें तो यहां चिकित्सक तो मौजूद रहते हैं लेकिन दवाओं की कमी से वे समुचित इलाज नहीं कर पाते हैं. ऐसे में बाहर जाकर दवा लानी पड़ती है. कभी-कभी तो बाहर में भी दवा नहीं मिल पाता है.
