दो जून की रोटी के लिए मोहताज, लेकिन 15 लाख की पुलिया बना दी

बिहार के झाझा में एक पंचर बनाने वाले मो सरफराज ने अपनी मेहनत की कमाई से गांव में पुलिया का निर्माण किया है. विधायक ने उनके इस नेक काम की जमकर सराहना की है.

झाझा (जमुई) . जेब में खाने के पैसे नहीं, लेकिन हौसले में 15 लाख की पुलिया बनाने का जज्बा. घोरिकवा गांव के सरफराज की कहानी सुनकर हर कोई दंग है. सड़क किनारे पंचर जोड़कर दो जून की रोटी कमाने वाले सरफराज ने अपने गांव में खुद के खर्च से पुलिया बनवा दी है. शनिवार को एआईएमआईएम के बिहार प्रदेश अध्यक्ष सह विधायक अख्तरुल इमाम ने इस 35 फीट लंबी और 14 फीट चौड़ी पुलिया का उद्घाटन किया.

दादी के जनाजे ने बदल दी जिंदगी

सरफराज बताते हैं- 2019 में तेज बारिश के दिन दादी का इंतकाल हुआ था. जनाजा लेकर नाले तक पहुंचे, तो पानी इतना था कि 4 घंटे तक दादी के शव को किनारे रखना पड़ा. बारिश थमने के बाद किसी तरह नाला पार किया. उसी दिन हमने कसम खायी कि अब गांव के किसी जनाजे को ये तकलीफ नहीं होगी. उसके बाद सरफराज घर-बार छोड़कर महाराष्ट्र के पुणे चला गया. वहां सड़क किनारे बैठकर पंचर बनाता और एक-एक पैसा जोड़ता रहा. छह साल में जो पूंजी जमा हुई, उसी से इस साल उसने गांव लौटकर पुलिया बनानी शुरू कर दी.

विरोध भी झेला, पर हारा नहीं

नयी पुलिया से होने लगा आवागमन.

सरफराज का कहना है कि पुलिया बनवाने के लिए उसने पंचायत से लेकर सांसद तक गुहार लगायी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. जब खुद बनाने लगा तो स्थानीय स्तर पर धमकियां भी मिलीं. लोगों ने कहा कि पागल हो गया है, लेकिन दादी से किया वादा याद था. 12 से 15 लाख की लागत से बनी इस पुलिया के दोनों तरफ 25-25 फीट की दीवार भी है. अब बरसात में भी ग्रामीणों, खासकर जनाजा को नाला पार करने में दिक्कत नहीं होगी.

इसके पास रहने-खाने की जगह नहीं, फिर भी...

गांव के एहसान, गुड्डू व शाहिद कहते हैं- इस लड़के के पास ठीक से खाने-रहने की जगह नहीं है. फिर भी उसने इतना बड़ा काम कर दिया. आज पूरे गांव को सहूलियत हो गयी. उद्घाटन के मौके पर विधायक अख्तरुल इमाम ने सरफराज की सराहना की. उन्होंने कहा कि दूसरों का दर्द अपना समझकर काम करने वाले लोग ही असली समाजसेवी हैं. दृढ़ संकल्प हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं. आज जिस सरफराज के पास कल तक पंचर का औजार था, उसके घर अब दुआ देने वालों की भीड़ लग रही है. एक पंचर बनाने वाले ने साबित कर दिया कि नियत साफ हो तो सिस्टम की कमी भी जिद से पार की जा सकती है.

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लेखक के बारे में

By ऋतांबर सिंह

ऋतांबर सिंह प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. झाझा (जमुई) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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