श्रीराम के प्रति केवट की निष्कपट भक्ति प्रसंग सुन श्रोताओं की भीग गयीं आंखें

ऐतिहासिक पंचमंदिर परिसर में सनातन संस्कृति सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित नौ दिवसीय विराट महायज्ञ श्रद्धा और भक्ति के माहौल में निरंतर जारी है.

गिद्धौर . ऐतिहासिक पंचमंदिर परिसर में सनातन संस्कृति सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित नौ दिवसीय विराट महायज्ञ श्रद्धा और भक्ति के माहौल में निरंतर जारी है. महायज्ञ के सातवें दिन रविवार की देर संध्या रामकथा और रामलीला के भावपूर्ण प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया. कथा स्थल जय श्रीराम के गगनभेदी जयघोष से गुंजायमान हो उठा. श्रीधाम वृंदावन से पधारे सुप्रसिद्ध कथा प्रवक्ता पंडित कृष्णकांत जी महाराज ने रामकथा के दौरान भगवान श्रीराम के वनगमन और केवट प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया. उन्होंने बताया कि अयोध्या में श्रीराम के राजतिलक की तैयारियों के बीच माता कैकेई ने अपने पूर्व वचनों का स्मरण कराते हुए महाराज दशरथ से श्रीराम के लिए वनवास और भरत के लिए राजगद्दी की मांग रख दी. वचनबद्ध होने के कारण महाराज दशरथ को यह कठोर निर्णय स्वीकार करना पड़ा और भगवान श्रीराम माता सीता व भ्राता लक्ष्मण के साथ वनवास को प्रस्थान कर गये. कथा के क्रम में केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए पंडित कृष्णकांत जी महाराज ने बताया कि गंगा तट पर केवट ने प्रभु श्रीराम को नाव में बैठाने से पहले उनके चरण पखारने की शर्त रखी. केवट का भाव था कि श्रीराम के चरणों की धूल से कहीं उसकी नाव भी अहल्या की तरह स्त्री न बन जाये. केवट की निष्कपट भक्ति और सरल भाव से भगवान श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे भक्ति व मोक्ष का वरदान दिया. यह प्रसंग सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गयीं. कथा के दौरान गिद्धौर की दो बालिकाओं ने भगवान श्रीराम और जनकनंदिनी माता सीता का रूप धारण कर मंच पर प्रस्तुति दी, जिससे श्रद्धालु भावविभोर हो उठे. श्रद्धालुओं ने हल्दी का लेप लगाकर दर्शन किये, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय बन गया. इधर महायज्ञ के अंतर्गत आयोजित रामलीला में रावण द्वारा सीता हरण के बाद लंका युद्ध का सजीव मंचन किया गया. भगवान श्रीराम की सेना का लंका पहुंचना, लक्ष्मण और मेघनाद के बीच हुए भीषण युद्ध तथा मेघनाद वध के दृश्य ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया. रामलीला देखने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और धार्मिक आयोजन का आनंद लिया.

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By PANKAJ KUMAR SINGH

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