परंपरा को रोशन करने के लिए विरासत की चाक ने पकड़ी रफ्तार

दीपों का उत्सव यानी दीपावली अधर्म पर धर्म की तथा अंधेरे पर प्रकाश की जीत का पर्व है. इस पर्व में मिट्टी से बने दीये का पारंपरिक महत्व है, पर बदलते परिवेश में बिजली से जलने वाले चाइनीज झालरों ने दीये की जगह ले ली है.

अर्जुन अरनव, जमुई

दीपों का उत्सव यानी दीपावली अधर्म पर धर्म की तथा अंधेरे पर प्रकाश की जीत का पर्व है. इस पर्व में मिट्टी से बने दीये का पारंपरिक महत्व है, पर बदलते परिवेश में बिजली से जलने वाले चाइनीज झालरों ने दीये की जगह ले ली है. विशेष बात तो यह है कि मिट्टी के दीये के बगैर इस पर्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती. दीपावली में दीयों से जहां प्रकृति के साथ एकमेव होने का स्वाभाविक अनुभूति होती है, वहीं इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है. दीये निर्माण से जुड़े कुम्हार समाज भी खुश रहते थे. मगर कालांतर में भौतिकता की चमक-दमक में हम परंपरा से दूर होते चले गये. बिजली के जगमगाते बल्ब मनभावन लगने लगे और दीये की लौ सिर्फ पूजा घरों में सिमट कर रह गयी. लेकिन विगत कुछ वर्षों से लोकल फॉर वोकल के नवीन घोष के बाद अब लोग अपनी परंपरा की ओर लौटने लगे हैं.

बढ़ गयी है मिट्टी के दीये की डिमांड

मिट्टी के दीये की डिमांड बढ़ने से इस पेशे में लगे कुम्हार की धीमी पड़ी चाक ने गति पकड़ ली है. मिट्टी के दीये की डिमांड बढ़ने के साथ ही निर्माण भी युद्ध स्तर पर शुरू हो गया है, ताकि दीपावली तक ज्यादा से ज्यादा स्टॉक रखा जा सके. दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीये में तेल डाल कर जलाना काफी शुभ माना जाता है. वहीं दीये का प्रयोग छठ के मौके पर भी होता है.

80-100 रुपये में मिल रहे मिट्टी के सौ दीये

डिमांड बढ़ने से दीये के दाम में भी वृद्धि हुई है. पहले दीये 50 रुपये में 100 पीस मिलते थे. लेकिन, डिमांड बढ़ने से इस वर्ष 80 से 100 रुपये में 100 दीये मिल रहे हैं. अलग-अलग आकार के दीये की अलग-अलग कीमतें हैं. अब आकर्षक और डिजाइनर दीये भी बाजार में उपलब्ध हैं.

मिट्टी के दीये जलाने के हैं धार्मिक महत्व

मिट्टी के दीये का काफी धार्मिक महत्त्व है पूजा पाठ से लेकर हर जगह मिट्टी के दीये जलाये जाते हैं. इसका आध्यात्मिक महत्त्व भी है. मान्यता है कि दीये से निकलने वाली रंग बिरंगी रोशनी लोगों के जीवन में खुशियां का प्रतीक है. दीये के शारीरिक लाभ अंतर्गत बरसात के बाद उत्पन्न कीड़े मकोड़े इसमें जल जाते हैं. वहीं इसका आर्थिक फायदा भी है इस धंधे से जुड़े लोगों को भी रोजगार मिल जाता है.

अब इलेक्ट्रिक चाक पर बनते हैं दीये

जैसे-जैसे समाज में आधुनिकता बढ़ रही है, वैसे-वैसे लोग भी समय के अनुसार अपने को ढाल रहे हैं. पहले जहां कुम्हार हाथ की चाक पर मिट्टी के बर्तन और दीये का निर्माण करते थे. अब इलेक्ट्रिक चाक पर दीये का निर्माण कार्य किया जा रहा है. इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की मानें तो पहले मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने में काफी समय लग जाता था. और समय पर दीये और बर्तन बाजार नहीं पहुंच पाता था. लेकिन अब इलेक्ट्रिक चाक से कम समय में अधिक दीये और मिट्टी के बर्तन बन जाता है और समय पर बाजार में पहुंच जाता है. इलेक्ट्रिक चाक से जिससे हमलोगों को काफी सहुलियत हुयी है.

मिट्टी नहीं मिलने से होती है परेशानी

इस कारोबार में लगे पवन पंडित, राहुल कुमार, दीपू पंडित, हजारी पंडित, सहित अन्य लोगों ने बताया कि वर्तमान समय में दीए बनाने के लिए मिट्टी नहीं मिलने से काफी परेशानी होती है. दूर दराज के इलाके से मिट्टी लाते हैं इसमें खर्च भी ज्यादा आते हैं इसलिए मिट्टी के दीये का दाम बढ़ गया है.

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By PANKAJ KUMAR SINGH

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