जमुई : जिले के खैरा प्रखंड क्षेत्र के दाविल पंचायत के कहरडीह महादलित टोला के लोगों को शुद्ध पेयजल के लिए काफी जिल्लत का सामना करना पड़ रहा है. ग्रामीणों की माने तो हमलोग के टोला में एक सरकारी चापाकल है, जिससे किसी तरह हमलोग अपनी प्यास बुझा लेते हैं. हमलोगों को नहाने और पानी से जुड़ी अन्य आवश्यकताओं को लेकर काफी जद्दोजहद करना पड़ता है.
यह कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि सालों भर हमारे टोला में यह समस्या इसी तरह बनी रहती है. अगर हमारे टोला में लगा हुआ है चापाकल खराब हो जाता है तो हम लोगों को शुद्ध पानी के लिए इधर उधर भटकना पड़ता है. हमारी समस्या को सुनने वाला कोई नहीं है. हम लोग सभी जगह कह कर थक चुके हैं. अब किसको जाकर कहीं यही समझ में नहीं आता है. चापाकल खराब होने के बाद कभी हम लोग मुखिया और कभी पीएचडी के अधिकारियों के पास अपनी समस्या को लेकर दौड़ लगाते हैं. लेकिन हमारी समस्या दूर होने की वजह जस की तस बनी रह जाती है और हमलोगों को आपस में चंदा करके ठीक कराना पड़ता है. सबसे अधिक परेशानी पीने के पानी के लिए ही होती है. क्योंकि हमारे टोला में लगा हुआ चापाकल खराब होने पर हम लोगों को बहुत थोड़े पानी से ही अपनी प्यास बुझानी पड़ती है.
दूर से ढोकर हमलोग लाते हैं पानी
सुरुचि देवी, जमुनी देवी, करीमन देवी, भगिया देवी, सुरजी देवी, जमुना देवी, सुमन देवी, गिरिजा देवी कहती हैं कि हम लोगों को दूसरे जगह से बहुत ही मुश्किल से पानी ढोकर लाना पड़ता है. क्योंकि एक चापाकल के बलबूते तो हमलोगों की प्यास बुझ ही नहीं पाती है और पानी से जुड़ा कोई भी कार्य पूरा नहीं हो पाता है. इसलिए हम लोगों को पानी के लिए बहुत ही फजीहत झेलनी पड़ती है और अलग-अलग जगह से पानी लाना पड़ता है.
कौन सुनेगा हमलोगों की समस्या
ग्रामीण अर्जुन मांझी, शंभू मांझी, कारू मांझी, हरि मांझी, रामकिशन मांझी, प्रकाश मांझी, परमेश्वर मांझी, सनोज मांझी, तिलक मांझी, गिरजा मांझी, मनोज मांझी आदि बताते हैं कि बाबू हमारे गांव में लगा हुआ चापाकल तो अक्सर खराब हो जाता है और हम लोग पीने के पानी के लिए सभी जगह गुहार लगा लगा कर थक जाते हैं. लेकिन कोई हमारी समस्या को नहीं सुनता है. ऐसे में तो यह लगता है कि हम महादलितों की समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है. सब सिर्फ आश्वासन देते हैं. लेकिन काम के नाम पर सब हवा-हवाई है. हमलोगों के लिए दूध से भी ज्यादा अहमियत पानी ही रखता है और क्योंकि पानी के लिए हमलोगों को बहुत ही परेशान होना पड़ता है. दूध तो इधर उधर भटकने के बाद आसानी से मिल भी जाता है.
