Indian Railways: करीब 17 साल तक फाइलों में दबे रहने के बाद जलालगढ़-किशनगंज नई रेल लाइन प्रोजेक्ट पर फिर हलचल तेज हुई है. रेलवे ने इस 51.632 किमी लंबी परियोजना की डीपीआर रेलवे बोर्ड को भेज दी है और अब अंतिम मंजूरी का इंतजार है.
यदि यह योजना धरातल पर उतरती है, तो सीमांचल के रेल नक्शे में ऐतिहासिक बदलाव संभव है.
17 साल बाद फिर जगी उम्मीद
जलालगढ़-किशनगंज रेल लाइन का शिलान्यास 2008-09 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने किया था. उस समय इसकी लागत लगभग 360 करोड़ रुपये आंकी गई थी. लेकिन वर्षों की देरी और प्रशासनिक सुस्ती के कारण अब यही परियोजना बढ़कर 1852 करोड़ रुपये की हो गई है.
इसके बनने से कटिहार से किशनगंज की दूरी कम होगी और पूर्णिया प्रमंडल सीधे रेल नेटवर्क से मजबूत तरीके से जुड़ जाएगा. साथ ही एनजेपी की दिशा से आने वाली ट्रेनें पूर्णिया होकर कटिहार जा सकेंगी, जिससे यात्रियों और व्यापार दोनों को लाभ होगा.
जलालगढ़, अमौर और बैसा जैसे बाढ़ प्रभावित प्रखंड इस रेललाइन से सीधे जुड़ेंगे. इससे स्थानीय कृषि उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचने का रास्ता मिलेगा और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है.
पूर्णिया में एक सदी बाद रचा जाएगा इतिहास
पूर्णिया के लिए यह रेल लाइन सिर्फ एक कनेक्टिविटी नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक गौरव की बात है. 15 सितंबर 1928 (पूर्णिया-मुरलीगंज लाइन) के बाद से जिले में कोई भी नई रेल लाइन नहीं बिछाई गई है. अगर यह प्रोजेक्ट पूरा होता है, तो लगभग 100 साल बाद पूर्णिया के रेल मानचित्र पर यह सबसे बड़ी उपलब्धि होगी. इस नई लाइन पर खाताहाट, रौटा और महीनगांव समेत कुल 8 नए स्टेशन बनाने का प्रस्ताव है, जिससे ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदल जाएगी.
यह रेल लाइन न केवल आम लोगों का सफर आसान करेगी, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी भारत के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित होगी. यह ‘चिकन नेक’ कहे जाने वाले संवेदनशील इलाके के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करेगी.
एनजेपी से कटिहार का सफर होगा छोटा
वर्तमान में कटिहार से किशनगंज जाने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता है, लेकिन इस नई लाइन के चालू होते ही यह दूरी काफी कम हो जाएगी. एनजेपी (NJP) से आने वाली ट्रेनें सीधे पूर्णिया होकर कटिहार निकल सकेंगी.
पूर्णिया टाइम्स सोशल ग्रुप ने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से जल्द फंड जारी करने की गुहार लगाई है. अब देखना यह है कि क्या केंद्र सरकार इस बजट में सीमांचल के इस पुराने सपने को हकीकत में बदलने के लिए खजाना खोलती है.
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