hajipur news. वैशाली में महागठबंधन की खींचतान एनडीए के लिए बना अवसर

महागठबंधन के दो प्रमुख उम्मीदवार राजद के अजय कुशवाहा और कांग्रेस के इ संजीव सिंह के बीच दोस्ताना संघर्ष ने कार्यकर्ताओं को दो खेमों में बांट दिया है

पटेढ़ी बेलसर. वैशाली विधानसभा चुनाव इस बार सिर्फ राजनीतिक दलों का संघर्ष नहीं, बल्कि जातीय समीकरणों, रणनीतिक राजनीति और गठबंधन की अंदरूनी कलह का दिलचस्प संगम बन गया है. महागठबंधन के दो प्रमुख उम्मीदवार राजद के अजय कुशवाहा और कांग्रेस के इ संजीव सिंह के बीच दोस्ताना संघर्ष ने कार्यकर्ताओं को दो खेमों में बांट दिया है. स्थिति यह है कि महागठबंधन के कार्यकर्ता खुलकर किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में नहीं दिख रहे, बल्कि जातीय समर्थन के आधार पर झुकाव तय करने की रणनीति बना रहे है.

महागठबंधन की इस दरार ने जहां मुकाबले को और रोमांचक बना दिया है, वहीं एनडीए के लिए यह अवसर भी बन गया है कि वह अपने वोट बैंक को एकजुट बनाए रखे. एनडीए में जदयू, भाजपा और अन्य सहयोगी दलों की मजबूती और एकता चुनावी नतीजों में निर्णायक साबित हो सकती है.

अतिपिछड़ी जातियों में नहीं दिख रहा एकतरफा रुझान

सवाल यह भी है कि एनडीए के कार्यकर्ता कितनी मजबूती से एक स्वर में चुनाव मैदान में डटे दिखते हैं. 2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर लोजपा (आर) के टिकट पर अजय कुशवाहा को उम्मीदवार बनाया था. उस चुनाव में लोजपा (आर) को 33,551 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी इ संजीव सिंह को 62,367 वोट प्राप्त हुए. जदयू के सिद्धार्थ पटेल को सबसे अधिक 69,780 वोट मिले और जीत का अंतर मात्र सात हजार के आसपास रहा. उस समय वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी एनडीए के साथ थे, जिससे सहनी समाज का वोट लगभग एकमुश्त जदयू के पक्ष में गया. इस चुनाव में राजनीतिक और जातीय परिदृश्य बदल चुका है. वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी अब महागठबंधन का हिस्सा हैं, वहीं चिराग पासवान एनडीए के साथ खड़े है. सहनी और पासवान दोनों जातियों की जनसंख्या वैशाली में लगभग बराबर बताई जाती है. जिससे ये समुदाय निर्णायक भूमिका निभा सकते है. नोनिया जाति, जिसने पिछले चुनाव में जदयू को समर्थन दिया था, इस बार दो हिस्सों में विभाजित दिखाई दे रही है. अन्य अतिपिछड़ी जातियों में भी एकतरफा रुझान नहीं दिख रहा है. कुर्मी समुदाय, जिसे जदयू का पारंपरिक वोटर माना जाता है, मौजूदा विधायक के कार्यकाल को लेकर नाराज बताया जा रहा है. यदि जदयू मतदान के दिन तक इस नाराजगी को दूर कर लेती है, तो मुकाबला आमने सामने की हो सकती है.

बिखरता दिख रहा राजपूत व भूमिहार का वोट

वहीं, अगड़ी जातियों में राजपूत और भूमिहार का वोट इस बार बिखरता हुआ नजर आ रहा है. इससे एनडीए और महागठबंधन, दोनों के लिए चुनौती बढ़ी है. महागठबंधन के समर्थकों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है. दोनों दलों के कार्यकर्ता यह तय नहीं कर पा रहे कि किस उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जाए. वर्तमान विधायक सिद्धार्थ पटेल के चाचा और पूर्व मंत्री वृशिण पटेल ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर चुनाव को और पेचीदा बना दिया है. उनके चुनाव में उतरने से कुर्मी वोट में बिखराव की स्थिति बन रही है. वृशिण पटेल अपने कार्यकर्ता आधार और जनसंपर्क अभियान पर भरोसा जताते हुए पूरे दमखम से मैदान में डटे हुए है.

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