Hajipur News: मौसम की मार से फीकी पड़ी लीची की मिठास

Hajipur News: मौसम की मार से फीकी पड़ी लीची की मिठास, गोरौल और आसपास के क्षेत्रों में इस बार कम हुई पैदावार, किसानों और व्यापारियों की बढ़ी चिंता

Hajipur News:(सुजीत कुमार झा) मुजफ्फरपुर जिले से सटे वैशाली के गोरौल प्रखंड और आसपास के इलाके अपनी लालिमा और स्वादिष्ट लीची के लिए काफी प्रसिद्ध हैं. यहां उपजने वाली लीची न सिर्फ स्थानीय बाजारों बल्कि देश के विभिन्न शहरों तक अपनी खास पहचान रखती है. राष्ट्रीय राजमार्ग-22 के दोनों ओर फैले लीची के बगीचे और सड़क किनारे बिकती लाल-लाल लीचियां राहगीरों को रुकने पर मजबूर कर देती हैं. गुजरने वाले यात्री अपनी जरूरत के अनुसार लीची खरीदकर ले जाते हैं, लेकिन इस बार लीची की कम पैदावार ने किसानों और व्यापारियों दोनों की चिंता बढ़ा दी है.

इस वर्ष लीची की फसल अपेक्षा के अनुसार नहीं हुई है. मौसम की मार के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिससे कारोबार पर भी असर पड़ा है. पिछले वर्ष जो लीची 80 से 100 रुपये प्रति सैकड़ा बिक रही थी, वही इस बार 200 से 300 रुपये प्रति सैकड़ा तक बिक रही है. उत्पादन कम होने से बाजार में दाम तो बढ़े हैं, लेकिन किसानों और व्यापारियों को नुकसान की आशंका भी सता रही है.

लाखों में बिकते हैं लीची के बगीचे

क्षेत्र के कई किसान ऐसे हैं जिनके लीची के बगीचे 20 लाख रुपये से अधिक कीमत में बिकते हैं. कई किसान अपने बगीचे वर्षों के लिए पहले ही स्थानीय व्यापारियों को बेच देते हैं. बगीचे की देखभाल से लेकर फलों की तोड़ाई तक का कार्य स्थानीय व्यापारी ही करते हैं और बाद में बाहरी व्यापारियों को लीची बेचते हैं.

स्थानीय किसान सीधे बाहरी व्यापारियों को बगीचा बेचना पसंद नहीं करते. खास बात यह है कि यदि व्यापारियों को घाटा होता है तो उसकी भरपाई भी किसानों को ही करनी पड़ती है। इस बार फसल कम होने के कारण किसानों और व्यापारियों दोनों के चेहरे मुरझाए हुए हैं.

हजारों एकड़ में होती है लीची की खेती

एनएच-22 से सटे कटरमाला, फकुली, केशरावां, इस्लामपुर, सधोपुर जीवन, बेलवर और सिहमा सहित कई गांवों में बड़े पैमाने पर लीची की खेती की जाती है. इसके अलावा पटेढ़ी बेलसर प्रखंड के सिहमा, कतारू, चिंतामनीपुर और चकगुलामुद्दीन जैसे गांवों में भी हजारों एकड़ में लीची के बगीचे फैले हुए हैं.

यहां के किसान मुख्य रूप से शाही और चाइना लीची की खेती करते हैं. कटरमाला पंचायत के कई गांव तो लीची के बगीचों के बीच बसे हुए हैं। क्षेत्र के दर्जनों परिवारों की आजीविका पूरी तरह लीची उत्पादन पर निर्भर है. घर के पूजा-पाठ, मांगलिक कार्य और बच्चों की पढ़ाई तक का खर्च लीची की आमदनी से ही चलता है.

लीची से ही बदलती रही किसानों की जिंदगी

स्थानीय किसानों का कहना है कि लीची की खेती से उन्हें हर साल लाखों रुपये की आय होती रही है. इसी आय से कई किसानों ने अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाई और बड़े शहरों में मकान भी बनाए। लेकिन इस बार कम पैदावार ने उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर दिया है.

लीची व्यापारी शंभू सहनी, अरुण साह, सोयब मियां, समी आलम और धीरज पांडेय सहित कई व्यापारियों ने बताया कि यहां से लीची मुंबई, दिल्ली, उत्तर प्रदेश समेत बिहार के विभिन्न शहरों में भेजी जाती है. लेकिन इस बार फसल कम होने के कारण लाखों रुपये के नुकसान की आशंका है.

किसानों के लिए मुख्य नकदी फसल है लीची

प्रखंड कृषि पदाधिकारी शिव जी पासवान ने बताया कि इस क्षेत्र में लीची की खेती बड़े पैमाने पर होती है और किसानों की नगदी आय का मुख्य जरिया भी यही है. उन्होंने कहा कि किसानों को हर संभव सुविधा और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि भविष्य में बेहतर उत्पादन हो सके.

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Published by: Vivek Ranjan

विवेक रंजन पाण्डेय पिछले 8 वर्षों से टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने Aryabhatta Knowledge University, Patna से BJMC की पढ़ाई की है.

उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत Network 10 टीवी चैनल से की. इसके बाद News India, News18 Digital सहित कई राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों में फील्ड रिपोर्टिंग और कंटेंट राइटिंग का अनुभव प्राप्त किया.

वर्तमान में वह प्रभात खबर डिजिटल की बिहार टीम में Content Writer के रूप में कार्यरत हैं. यहां बिहार की राजनीति, चुनाव, शिक्षा, कृषि, रोजगार, सरकारी योजनाओं, सामाजिक सरोकारों और विभिन्न जिलों की महत्वपूर्ण खबरों पर तथ्यपरक और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुंचाते हैं.

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