कौमुदी महोत्सव में बही काव्य की रसधारा

शहर की साहित्यिक संस्था किरण मंडल की ओर से 78 वां कौमुदी महोत्सव मनाया गया. स्थानीय यादव चौक स्थित एक होटल के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में देर रात तक काव्यरस की धारा बहती रही. शरद पूर्णिमा को कवियों ने अपने गीत-गजलों से यादगार बनाया.

हाजीपुर. शहर की साहित्यिक संस्था किरण मंडल की ओर से 78 वां कौमुदी महोत्सव मनाया गया. स्थानीय यादव चौक स्थित एक होटल के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में देर रात तक काव्यरस की धारा बहती रही. शरद पूर्णिमा को कवियों ने अपने गीत-गजलों से यादगार बनाया. कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्था के अध्यक्ष डा शैलेंद्र राकेश ने कहा कि अभियंत्रण क्षेत्र के आविष्कारों ने संवेदना के विरुद्ध साहित्य का विकल्प तैयार करने की कोशिश की है जो चिंताजनक है. साहित्य मनुष्यता के साथ संबंध बनाए रखने का पवित्र माध्यम है. लिखने और कहने वालों ने अपना काम नहीं छोड़ा, लेकिन पढ़ने और सुनने वालों ने साहित्य का विकल्प खोज लिया है. संस्था के सचिव और रंगकर्मी जयप्रकाश ने किरण मंडल की सांस्कृतिक परंपरा पर प्रकाश डाला. कार्यक्रम का संचालन आकाशवाणी केंद्र, पटना की उद्घोषक ऋचा कुमारी ने किया. इस अवसर पर किरण मंडल के संस्थापक सचिव डा दामोदर प्रसाद के काव्य संग्रह ””””बेशरम हवा चली”””” तथा अश्विनी कुमार आलोक एवं नंदकिशोर राय के संपादन में प्रकाशित पुस्तक ””””मैं मोहनपुर”””” का विमोचन किया गया. बेशरम हवा चली के संबंध में ललिता वरदान ने कहा कि यह पुस्तक उनकी असंकलित कविताओं को बचाने का प्रयास है. वहीं पत्रकार और लेखक सुरेंद्र मानपुरी ने पुस्तक मैं मोहनपुर की समीक्षा करते हुए कहा कि यह समस्तीपुर जिले के गंगा तटवर्ती क्षेत्र के जनजीवन का दस्तावेज है. कार्यक्रम की शुरुआत बालक शिवांश युग की सरस्वती वंदना से हुई. कवि गोष्ठी में सीतामढ़ी के युवा गीतकार गौतम वात्स्यायन ने प्रेम कविताओं से श्रोताओं को अभिभूत किया. उनकी कविता, मुझको उसका चेहरा पल पल खींच रहा, सागर जैसे दरिया का जल खींच रहा… को श्रोताओं ने खूब सराहा. मुजफ्फरपुर के गीतकार प्रवीण कुमार मिश्र ने बज्जिका गीत, कोन रहइअ गांव में, बड़-पीपर के छांव में… सुनाकर गांव के बदले परिदृश्य को रेखांकित किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बक्सर से आये लक्ष्मीकांत मुकुल ने अपनी कविता कौन खोद रहा है हमारा कोनसिया घर, जिसमें बड़े जतन से रखा था मड़ुए का बीज… सुनाकर गांव के विद्रूप हो चुके चेहरे पर चिंता प्रकट की. औरंगाबाद से आये वरिष्ठ कवि नरेश कुमार विश्वकर्मा ने अपनी कविता नदियों को सहारा देते हैं किनारे, विडंबना देखिए कि अपने ही किनारों को काट देती हैं नदियां… में संवेदना को लीलते स्वांग की चर्चा की. डा शैलेंद्र राकेश ने अपनी गजल, मरने की तमन्ना में जीते रहे शाम-ओ-सहर, तुमने देखा ही कहां अपनी दुआओं का असर… सुनाकर श्रोताओं की तालियां बटोरीं. संस्था के महासचिव अश्विनी कुमार आलोक ने अपनी कविता, याद रखो ऐ दुनिया वालों, अगर ये प्यार नहीं होगा, यह धरती भी नहीं बचेगी, यह संसार नहीं होगा… में प्यार को बचाने की जरूरत बतायी. संस्था के सचिव सुमन कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया.

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By DEEPAK MISHRA

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