गोपालगंज का सिंहासनी धाम क्यों है खास? आज भी मौजूद हैं 208 कुएं और 208 पोखर, पांडवों के राजसूय यज्ञ से जुड़ी है मान्यता

Gopalganj Sinhasani Dham :गोपालगंज के सिंहासनी धाम में त्रेतायुग से लेकर द्वापरयुग तक की प्राचीन मान्यताएं जीवंत हैं. बाबा धनेश्वर नाथ मंदिर से जुड़ी इन कहानियों में भगवान राम, माता जानकी और पांडवों के राजसूय यज्ञ का उल्लेख है. इसके साथ ही, 208 कुओं और 208 पोखरों की एक अनूठी कथा भी इस स्थल को विशेष बनाती है.

Gopalganj Sinhasani Dham : गोपालगंज के बैकुंठपुर प्रखंड में स्थित सिंहासनी धाम धार्मिक आस्था के साथ अपनी प्राचीन मान्यताओं और लोककथाओं के लिए भी चर्चित है. यहां बाबा धनेश्वर नाथ का ऐतिहासिक शिव मंदिर है, जिसे स्थानीय परंपराएं त्रेतायुग और द्वापरयुग से जोड़ती हैं. मंदिर परिसर और आसपास 208 कुएं तथा 208 पोखरों की कहानी भी सुनाई जाती है. पांडवों के राजसूय यज्ञ और सुपन भगत से जुड़ी कथा इस स्थल को और खास बनाती है.

त्रेतायुग से जुड़ी है सिंहासनी धाम की मान्यता

सिंहासनी धाम स्थित बाबा धनेश्वर नाथ मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में प्राचीन धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं. पुराने लोगों द्वारा सारण गजट का हवाला देते हुए बताया जाता रहा है कि त्रेतायुग में जनकपुर की बारात यात्रा के दौरान अयोध्या से आए बारातियों का कलेवा इसी स्थान पर हुआ था. वापसी के दौरान भी बारात के यहां ठहरने की मान्यता है.

भगवान राम और माता जानकी की पूजा से जुड़ी कहानी

स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान राम ने यहां शिवजी की पार्थी बनाकर पूजा की थी. वहीं माता जानकी ने शक्ति की अधिष्ठात्री देवी मां दुर्गा की आराधना की थी. इन्हीं धार्मिक मान्यताओं के कारण सिंहासनी धाम को क्षेत्र के महत्वपूर्ण आस्था स्थलों में गिना जाता है.

द्वापरयुग में पांडवों के राजसूय यज्ञ की मान्यता

स्थानीय परंपरा के अनुसार महाभारत के बाद भगवान कृष्ण की प्रेरणा से हस्तिनापुर के राजा युधिष्ठिर ने पांडवों के साथ इसी स्थान पर राजसूय यज्ञ किया था. मान्यता है कि इसी यज्ञ के दौरान यहां ऐतिहासिक शिवलिंग की स्थापना हुई. हालांकि इन पौराणिक प्रसंगों को स्थानीय परंपरा और मान्यता के रूप में ही देखा जाता है.

208 कुएं और 208 पोखरों की कहानी

सिंहासनी धाम की सबसे चर्चित विशेषताओं में यहां बताए जाने वाले 208 कुएं और 208 पोखर शामिल हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार प्राचीन काल में यज्ञ के दौरान लोगों की सुविधा और आयोजन से जुड़ी जरूरतों को देखते हुए आसपास कुएं और पोखर खुदवाए गए थे. इनसे जुड़ी कई स्थानीय कथाएं आज भी प्रचलित हैं.

यज्ञ सामग्री से जुड़े हैं पोखरों के नाम

स्थानीय मान्यता के अनुसार इन पोखरों का इस्तेमाल यज्ञ सामग्री से जुड़ी जरूरतों के लिए भी किया जाता था. घीवही, तीलही, धूपही, मधुवा, धानकोही, दांगी, गांगी, अमही, रनिया, देवरनिया, नयकी, सेवाला, मटिया, पिपरिया और मुंडली जैसे नाम आज भी स्थानीय पहचान का हिस्सा हैं.

मुंडली पोखर के नाम के पीछे भी है मान्यता

स्थानीय लोगों के अनुसार पांडवों ने मुंडन संस्कार के बाद इसी पोखर में स्नान किया था. इसी वजह से इसका नाम मुंडली पोखर पड़ने की मान्यता है. यह कथा आज भी सिंहासनी धाम के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा मानी जाती है.

भक्त सुपन भगत की प्रतिमा

पुरातत्व विभाग की टीम कर चुकी है अध्ययन

सिंहासनी धाम स्थित बाबा धनेश्वर नाथ मंदिर का पुरातत्व विभाग की टीम निरीक्षण कर चुकी है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार टीम ने मंदिर परिसर और यहां से जुड़े ऐतिहासिक एवं पौराणिक तथ्यों का अध्ययन किया था. टीम का नेतृत्व पुरातत्व विभाग के निदेशक अतुल कुमार वर्मा ने किया था.

स्थानीय लोगों ने टीम को सौंपे लिखित अभिलेख

पुरातत्व विभाग की टीम के निरीक्षण के दौरान स्थानीय लोगों ने सिंहासनी धाम से जुड़े कुछ लिखित अभिलेख भी सौंपे थे. इन अभिलेखों के माध्यम से मंदिर और क्षेत्र से जुड़े पुराने संदर्भों की जानकारी टीम को दी गई. इस अध्ययन से स्थल के इतिहास को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा और बढ़ी.

सुपन भगत और भीम की कथा आज भी सुनाई जाती है

सिंहासनी धाम से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा सुपन भगत और पांडव भीमसेन की है. स्थानीय कथा के अनुसार राजसूय यज्ञ के दौरान यज्ञ की सफलता के लिए भगवान कृष्ण ने बताया कि एक सिद्ध महात्मा भोजन से वंचित हैं. इसके बाद युधिष्ठिर के कहने पर भीम उन्हें खोजने निकले.

कमंडल नहीं उठा सके भीम

कथा के अनुसार भीम वर्तमान एकडेरवां गांव पहुंचे, जिसे उस समय डोमडेरवा कहा जाता था. वहां संत सुपन भगत अपनी कुटिया में भजन कर रहे थे. भीम ने उन्हें यज्ञ में चलने को कहा. सुपन भगत ने पहले अपना कमंडल बाहर रखने के लिए कहा. कथा के अनुसार भीम अपनी पूरी ताकत लगाने के बावजूद कमंडल को हिला नहीं सके.

सुपन भगत की सीख से टूटा भीम का अहंकार

लोककथा के अनुसार अपनी शक्ति पर गर्व करने वाले भीम को जब कमंडल उठाने में सफलता नहीं मिली तो उनका अहंकार टूट गया. उन्होंने संत से क्षमा मांगी. इसके बाद सुपन भगत ने उन्हें भक्ति और शक्ति का महत्व समझाया और यज्ञ में जाने की बात स्वीकार की. स्थानीय परंपरा में यह कथा आज भी श्रद्धा के साथ सुनाई जाती है.

दिघवैत भूमिहारों से भी जुड़ा है सिंहासनी धाम

स्थानीय इतिहास और परंपराओं में सिंहासनी धाम का संबंध दिघवागढ़ और दिघवैत भूमिहारों से भी जोड़ा जाता है. बताया जाता है कि यह क्षेत्र कभी दिघवैत भूमिहारों का गढ़ था. एक स्थानीय मान्यता के अनुसार संत के श्राप के कारण उन्हें अपने मूल गांव दिघवा से पलायन करना पड़ा और वे इस इलाके में आकर बसे.

आज भी कई इलाकों में मिलते हैं दिघवैत भूमिहार

स्थानीय लोगों के अनुसार बिहार के कई जिलों में दिघवैत भूमिहार परिवार मौजूद हैं. दिघवा के आसपास भी ऐसे कई गांव बताए जाते हैं, जहां के लोग अपने इतिहास और परंपरा को सिंहासनी धाम तथा सुपन भगत की कथा से जोड़ते हैं.

धार्मिक आस्था के साथ विरासत का केंद्र

सिंहासनी धाम आज केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं है, बल्कि स्थानीय लोककथाओं, परंपराओं और प्राचीन स्मृतियों का भी केंद्र है. बाबा धनेश्वर नाथ मंदिर, 208 कुओं और पोखरों की मान्यता, पांडवों से जुड़ी कथाएं तथा सुपन भगत की कहानी इस स्थान को अलग पहचान देती हैं.

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लेखक के बारे में

By संजय कुमार अभय

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