Gopalganj News (राकेश कुमार) : प्रखंड मुख्यालय से महज 500 मीटर पश्चिम छतु बथुआ गांव होकर गुजरी हथुआ शाखा नहर पर बना पुल आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. बरसों से उपेक्षित और ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच चुके इस पुल को लेकर आखिरकार स्थानीय ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे गया. आक्रोशित ग्रामीणों ने पुल पर एकत्रित होकर विभाग, स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और विरोध प्रदर्शन किया. आक्रोशित ग्रामीणों का आरोप है कि दर्जनों बार लिखित और मौखिक शिकायत के बावजूद सोए हुए तंत्र ने आज तक अपनी आंखें नहीं खोली हैं.
स्कूली बसें और एम्बुलेंस भी जर्जर पुल से गुजरने को मजबूर
आक्रोशित ग्रामीणों ने बताया कि यह पुल करीब 65 वर्ष पुराना है. जो अब पूरी तरह खोखला और जर्जर हो चुका है. यह केवल एक पुल नहीं, बल्कि क्षेत्र के करीब एक दर्जन गांवों की जीवन रेखा है. इस खतरनाक हो चुके पुल से होकर प्रतिदिन स्कूली बसें, पुलिस-प्रशासनिक वाहन, एम्बुलेंस और हजारों राहगीर जान जोखिम में डालकर गुजरने को मजबूर हैं. बथुआ बाजार का मुख्य मार्ग: पुल के उस पार प्रखंड का प्रमुख व्यावसायिक केंद्र बथुआ बाजार स्थित है. इस बाजार में प्रतिदिन 50 हजार से अधिक लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतें, साग-सब्जी और दवाइयां खरीदने आते हैं. इस भारी आवागमन के बीच पुल की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है. जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है.
ग्रामीण बोले-‘नेता बदल गए, लेकिन समस्या जस की तस’
प्रदर्शन कर रहे आक्रोशित लोगों ने प्रशासनिक उदासीनता पर तीखा प्रहार करते हुए कहा साल गुजरते गए. सूबे की सरकारें बदलीं, क्षेत्र के विधायक और सांसद बदले, लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो इस जर्जर पुल से गुजरने वाले भुक्तभोगी लोगों की तकदीर. जनता का कहना है कि चुनाव के समय वोट मांगने आने वाले नेता आज इस गंभीर समस्या से मुंह मोड़े बैठे हैं.
निर्माण नहीं हुआ तो चक्का जाम की चेतावनी
आक्रोशित ग्रामीणों ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे विभाग, वरीय अधिकारी और जनप्रतिनिधि किसी बड़ी मानवीय त्रासदी या हादसे का इंतजार कर रहे हैं. जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले अधिकारी और हमारे द्वारा चुने गए नेता आखिर इस दिशा में कदम क्यों नहीं उठा रहे हैं. ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में स्थानीय प्रशासन को चेताया है कि यदि अति शीघ्र इस ध्वस्तप्राय पुल के नवनिर्माण का कार्य शुरू नहीं किया गया, तो दर्जनों गांवों के लोग एकजुट होकर एक विशाल और उग्र आंदोलन के लिए विवश होंगे. इस आंदोलन से उत्पन्न होने वाली किसी भी अप्रिय स्थिति और चक्का जाम की संपूर्ण जवाबदेही स्थानीय प्रशासन एवं संबंधित जनप्रतिनिधियों की होगी.
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