बरौली. बसंत पंचमी पर सबसे पहले ‘वर दे वीणा वादिनी’ पंक्ति स्मृति में कौंधती है और साथ ही याद आते हैं इन पंक्तियों के रचयिता महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला. प्रखंड के देवापुर स्थित ‘संस्कार’ एजुकेशनल यूनिट में सभी शिक्षकों, ग्रामीणों तथा साहित्य प्रेमियों ने कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जयंती श्रद्धापूर्वक मनायी गयी. इस दौरान महाप्राण के तैलचित्र पर माल्यार्पण किया गया. स्कूल में निराला की जयंती धूमधाम से मनायी गयी. मौके पर संस्थान के संरक्षक तथा शिक्षक सत्येन्द्र सिंह ने बताया कि साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में यह परंपरा पड़ चुकी है कि कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्मदिन बसंत-पंचमी को मनाया जाता है. लोगों ने मान लिया है कि किसी और दिन उनका जन्म हो ही नहीं सकता क्योंकि बसंत-पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा होती है और निराला सरस्वती के वरद पुत्र थे. वहीं संस्थान के निर्देशक अनुराग विभु ने बताया कि निराला जी का वास्तविक जन्मदिन 21 फरवरी 1896 है. बसंत पंचमी को निरालाजी का जन्मदिन इसलिए मनाया जाता है कि उस वर्ष 21 फरवरी 1896 को ही बसंत पंचमी थी, इसलिए निराला जी स्वयं अपना जन्मदिन अंग्रेजी तिथि के बजाय बसंत पंचमी को ही मनाते रहे थे. भारतीय हिंदी साहित्य में वह एकमात्र ऐसे महाकवि लगते हैं, जिनके शब्द आज भी उतने ही अपराजेय, प्रभावी, शाश्वत और आधुनिक हैं. जन्मदिन मनाने वालों में मनोज कुमार, विनोद मिश्र, उज्जैन सिंह, भूलन सिंह, विवेकानंद तिवारी, विनोद सिंह, दूधनाथ सिंह, विकास सिंह सहित कई साहित्यप्रेमी थे.
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