Gayaji News : वरिष्ठ साहित्यकार मिथिलेश के निधन पर मगध विश्वविद्यालय के मगही विभाग में सोमवार को श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गयी. विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार सिंह की अध्यक्षता में आयोजित सभा में हिंदी, मगही और पत्रकारिता से जुड़े शिक्षक, कर्मचारी तथा छात्र-छात्राएं मौजूद रहे. मिथिलेश के 13 अगस्त की मध्यरात्रि के बाद निधन के उपरांत यह श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गयी.
‘मगधेश’ के निधन से साहित्य जगत में शोक
‘मगधेश’ नाम से विख्यात मिथिलेश का 70 वर्ष की उम्र में निधन हुआ. उनके निधन से मगही भाषा-भाषी समाज और प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े लोगों में शोक की लहर है. श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित लोगों ने उनके साहित्यिक योगदान को याद करते हुए उनकी तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी.
एक दर्जन से अधिक पुस्तकों में दिखी साहित्यिक प्रतिभा
अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. आनंद कुमार सिंह ने कहा कि मिथिलेश की लेखनी लगातार सक्रिय रही. उन्होंने एक दर्जन से अधिक पुस्तकों की रचना की. ‘रविया’, ‘मकर चानन’ और खंडकाव्य ‘खंडहर के भोर’ उनकी चर्चित कृतियों में शामिल हैं. उनकी ‘रविया’ और ‘सोनवाली’ जैसी रचनाएं मगही पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं. कहानी संग्रह ‘कलकल धार’ की कहानियों में मानवीय संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया गया है.
पत्रकारिता में भी छोड़ी अलग पहचान
डॉ. परम प्रकाश राय ने पत्रकारिता के क्षेत्र में मिथिलेश के योगदान को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि ‘हाथी’, ‘मेरा बचपन’, ‘विज्ञान’ और ‘अस्मिता’ जैसी पत्रिकाओं का सफल संपादन उनकी कर्मकुशलता और पैनी दृष्टि को दर्शाता है.
मगही और हिंदी साहित्य के लिए रहा अहम योगदान
डॉ. अनुज कुमार ‘तरुण’ ने उनके उपन्यास लेखन और स्थानीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास को सहेजने के प्रयासों की चर्चा की. डॉ. किरण कुमारी और राकेश रंजन ने कहा कि मिथिलेश मगही और हिंदी दोनों भाषाओं के प्रबल समर्थक थे. उनकी प्रेरणा से अनेक साहित्यकारों ने सृजन के क्षेत्र में कदम बढ़ाया.
वक्ताओं ने कहा कि उनकी रचनाओं में मगध, मगही भाषा और यहां के लोकजीवन की स्पष्ट झलक मिलती है. मानवीय संवेदनाओं को उन्होंने सहज और प्रभावी रूप में अपनी रचनाओं में स्थान दिया. उनके निधन को साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया गया.
