शेरघाटी की पहचान ''दुल्हिन मंदिर'' हो रहा खंडहर: महाबोधि मंदिर के बराबर है ऊंचाई, 6 साल पहले हुए सर्वे के बाद भी जीर्णोद्धार का इंतजार
गया जिले के शेरघाटी नगर में स्थित ऐतिहासिक दुल्हिन मंदिर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का एक प्रमुख केंद्र है, बल्कि ऐतिहासिक और वास्तुकला की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है.
शेरघाटी (गया). गया जिले के शेरघाटी नगर में स्थित ऐतिहासिक दुल्हिन मंदिर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का एक प्रमुख केंद्र है, बल्कि ऐतिहासिक और वास्तुकला की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है. करीब 160 वर्ष पुराना यह मंदिर अपनी अनोखी मान्यता, भव्य संरचना और ऊंचाई के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है. इसकी भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी ऊंचाई बोधगया स्थित विश्वविख्यात महाबोधि मंदिर के लगभग बराबर मानी जाती है, जो इसे और भी विशिष्ट बनाती है.
10 एकड़ में फैला है जमींदारी काल का इतिहास
इस विशाल दुल्हिन मंदिर का निर्माण जमींदारी काल में करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व तत्कालीन जमींदार रंगलाल कुंवर की पत्नी गणेश कुंवर द्वारा कराया गया था. उस दौर में यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी मुख्य स्थल हुआ करता था. लगभग 10 एकड़ में फैला यह विशाल मंदिर परिसर कभी अपनी समृद्धि के लिए जाना जाता था, लेकिन समय के साथ प्रशासनिक अनदेखी के कारण इसकी स्थिति जर्जर होती चली गई.
वास्तुकला का बेजोड़ नमूना, जिसे लोग कहते हैं ”शेरघाटी का अयोध्या”
मंदिर की बनावट और वास्तुकला इसे अन्य मंदिरों से एक अलग पहचान दिलाती है. स्थानीय सेवानिवृत्त शिक्षक और लेखक विजय कुमार दत्त बताते हैं कि अनुमंडल क्षेत्र में राम-जानकी का इतना भव्य मंदिर कहीं और देखने को नहीं मिलता. मंदिर का मुख्य द्वार ही उस समय की कलात्मक दक्षता और स्थापत्य कौशल का अद्भुत प्रमाण है. इस मंदिर का प्रभाव इतना रहा है कि इसके आसपास के इलाके का नाम ही ”दुल्हिन मुहल्ला” पड़ गया. शेरघाटी में दुल्हिन मुहल्ले को अयोध्या और नई बाजार तालाब क्षेत्र को जनकपुर के नाम से जाना जाता है. आज भी रामनवमी और रामयात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों में रथ यात्रा की समाप्ति इसी मंदिर परिसर में होती है.
पुरातत्व विभाग का सर्वे साबित हुआ कागजी
इतनी ऐतिहासिक और धार्मिक अहमियत के बावजूद यह मंदिर लंबे समय से उपेक्षा का शिकार है. उचित रखरखाव के अभाव में यह भव्य धरोहर अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रही है. मंदिर समिति के पूर्व सचिव अजीत कुमार सिंह के अनुसार, मंदिर के पास पर्याप्त संपत्ति होने के बावजूद इसकी समुचित देखरेख नहीं हो सकी. मंदिर के संरक्षण को लेकर नवंबर 2020 में पुरातत्व विभाग द्वारा एक सर्वे कराया गया था. उस वक्त स्थानीय लोगों में उम्मीद जगी थी कि अब मंदिर के जीर्णोद्धार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे. लेकिन, विडंबना यह है कि सर्वे के करीब छह वर्ष बीत जाने के बावजूद अब तक जीर्णोद्धार का कोई भी काम शुरू नहीं हो सका है. आज भी लोगों की नजरें प्रशासन और पुरातत्व विभाग पर टिकी हैं कि कब इस प्राचीन धरोहर को उसका खोया हुआ वैभव वापस मिलेगा.
रिपोर्ट: नवीन कुमार मिश्राB