गांव ने मान लिया था मृत, दशकर्म की तैयारी हुई; अचानक लौट आए पंडित ब्रह्मदेव शास्त्री, जानें पूरा किस्सा

पंडित ब्रह्मदेव शास्त्री को उनके गांव ने मृत मान लिया था और दशकर्म की तैयारी भी हो गई थी. अचानक उनकी वापसी ने सबको चौंका दिया. स्वतंत्रता सेनानी, कवि और समाज सुधारक के रूप में उनके बहुआयामी जीवन की यह अनूठी दास्तान प्रेरित करती है.

Gaya News : गया जी जिले के मैगरा गांव में पांच अक्तूबर 1915 को जन्मे पंडित ब्रह्मदेव शास्त्री बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे. कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, योगनिष्ठ साधक, प्रकृति-प्रेमी, समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने अपने जीवन में अलग पहचान बनायी.

उनके व्यक्तित्व में आध्यात्मिकता, मानवता, देशप्रेम, त्याग और सेवा-भाव का अद्भुत समन्वय था. शास्त्री जी ने हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी का गहन अध्ययन किया तथा ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की. उनकी साहित्यिक प्रतिभा अत्यंत प्रभावशाली थी.

उनकी रचनाओं में प्रकृति, अध्यात्म, मानव-प्रेम और राष्ट्रभक्ति की भावनाएं प्रमुख रूप से दिखायी देती हैं. उनकी साहित्यिक यात्रा ‘क्रंदन’ से शुरू होकर अनेक महत्वपूर्ण काव्य-कृतियों तक पहुंची.

आंदोलन व देशसेवा

युवावस्था में नवादा में आयोजित एक सभा में उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल का भाषण सुना. इस भाषण का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े. महात्मा गांधी के आह्वान से प्रेरित होकर उन्होंने स्वतंत्रता को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. आंदोलन के दौरान उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभायी और कई बार जेल भी गये.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वे अपने मित्र स्वतंत्रता सेनानी जगलाल महतो के साथ गिरफ्तारी से बचने के लिए नदी में उगी झाड़ियों में कई दिनों तक छिपे रहे. बताया जाता है कि दोनों ने कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने के लिए पैदल यात्रा भी की थी.

बिहार में आये भूकंप और अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी उन्होंने लोगों की सेवा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

जेल वापसी व शुद्धिकरण

मैगरा निवासी उनके भाई आचार्य पंडित तपेश्वर शास्त्री के बड़े पुत्र आचार्य योगेश्वर शास्त्री बताते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल जाने के बाद जब ब्रह्मदेव शास्त्री घर लौटे, तो उन्हें सामाजिक व पारिवारिक तिरस्कार का सामना करना पड़ा.

उस दौर में कुछ लोगों ने जेल में रहने को लेकर तरह-तरह की बातें कहें. कोई उनके खान-पान पर सवाल उठाता तो कोई जेल में रहने के दौरान उनकी शुचिता को लेकर टिप्पणी करता. इस व्यवहार से शास्त्री जी काफी आहत हुए. बताया जाता है कि वे बिना किसी को बताये कैलास-मानसरोवर और हिमालय की तराई की ओर चले गये.

काफी समय तक परिवार और गांव के लोगों को उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. गांव में लोगों ने उन्हें मृत मान लिया और उनका दशकर्म तक करने की तैयारी कर ली. बताया जाता है कि जिस दिन गांव में उनका दशकर्म कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा था, उसी दिन अचानक ब्रह्मदेव शास्त्री मैगरा लौट आये.

उनके लौटने पर गांव में आश्चर्य का माहौल बन गया. सामाजिक परंपरा के अनुसार गंगाजल से उनका शुद्धिकरण कराया गया और इसके बाद उन्हें पुनः समाज में शामिल किया गया.

कैलास यात्रा व कार्य

वर्ष 1952 में ब्रह्मदेव शास्त्री ने कठिन कैलास-मानसरोवर यात्रा की. यह यात्रा उनके जीवन का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पड़ाव बनी. यात्रा पर निकलने से पहले उन्होंने मैगरा निवासी अपने भाई रामबृक्ष शर्मा के नाम पत्र भी लिखा था. कैलास-मानसरोवर की इस कठिन यात्रा ने उनके चिंतन, साधना और साहित्य को नई दिशा दी. शास्त्री जी का जीवन केवल साहित्य और अध्यात्म तक सीमित नहीं था.

उन्होंने सामाजिक उत्थान के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किये. वर्ष 1937 में अपने गांव में ‘भारती कुटीर’ नामक पुस्तकालय की स्थापना में योगदान दिया. कन्या पाठशाला और महाविद्यालय की स्थापना के प्रयासों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. शिक्षा और सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने भूमि भी समर्पित की.

अडिग मनोबल व निधन

जीवन के अंतिम दौर में स्वतंत्रता सेनानी पंडित ब्रह्मदेव शास्त्री जी को गंभीर बीमारी के बावजूद उनका मनोबल और आध्यात्मिक विश्वास अडिग रहा. 11 सितंबर 1994 को उनका निधन हो गया. साहित्य, कला, स्वतंत्रता संग्राम, अध्यात्म और समाजसेवा के क्षेत्र में उनका योगदान आज भी प्रेरणा देता है.

पं. ब्रह्मदेव शास्त्री का जीवन संघर्ष, साधना, त्याग और समाजसेवा की ऐसी यात्रा है, जिसमें एक ओर स्वतंत्रता सेनानी का संघर्ष दिखाई देता है, तो दूसरी ओर कवि और साधक का आध्यात्मिक चिंतन. मैगरा की धरती पर जन्मे इस बहुआयामी व्यक्तित्व की स्मृतियां आज भी क्षेत्र के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं.

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लेखक के बारे में

By मनोज मिश्रा

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