शेरघाटी में विकास नहीं, जातीय गणित पर टिके प्रत्याशियों के सपने

गांव-गांव जातीय वोटबैंक की साधना में जुटे उम्मीदवार

11 नवंबर को मतदान, गांव-गांव जातीय वोटबैंक की साधना में जुटे उम्मीदवार प्रतिनिधि, शेरघाटी बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में 11 नवंबर को होने वाले मतदान को लेकर शेरघाटी में चुनावी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है. नामांकन वापसी के बाद यहां 14 उम्मीदवार मैदान में हैं और लगभग सभी प्रत्याशी जातीय समीकरण की गुत्थी सुलझाने में पूरी ताकत झोंक चुके हैं. हालांकि, सड़कों, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, शिक्षा व पलायन जैसे गंभीर मुद्दे हर भाषण में सुनाई देते हैं, लेकिन जमीनी रणनीति जातिगत वोटों को साधने पर केंद्रित है. प्रत्याशियों की गाड़ियां विकास के वादों के साथ नहीं, बल्कि जातीय आधार वाले टोले और मुहल्लों में ज्यादा दिखायी दे रही है. इस सीट पर चुनावी मुकाबला मुख्यत: लोजपा, राजद, जनसुराज व एआइएमआइएम के बीच दिलचस्प मोड़ लेता दिख रहा है. राजद ने गोला बाजार के एक व्यवसायी प्रमोद कुमार वर्मा पर भरोसा जताया है, जबकि एनडीए की ओर से मैदान में औरंगाबाद के बारुण के रहनेवाले बालू कारोबारी उदय कुमार सिंह ताल ठोंक रहे हैं. वहीं, जनसुराज ने पवन किशोर और एआइएमआइएम ने शाने अली खां को उम्मीदवार बनाया है, जो लगातार मुस्लिम समुदाय के बीच पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. कई निर्दलीय प्रत्याशी जैसे भगत यादव व कृष्णा यादव भी अपने-अपने जातीय वोटरों पर भरोसा कर चुनावी गणित बिगाड़ने-सम्भालने की स्थिति में हैं. बसपा से शैलेश कुमार मिश्र और समाजवादी लोक परिषद के पंकज कुमार मिश्र भी मैदान में मौजूद हैं और उनका लक्ष्य भी खास समुदायों को साधना ही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से शेरघाटी को विकास की राह दिखाने के वादे हुए लेकिन इस बार भी मुद्दे मंच तक ही सीमित हैं. मतदाताओं का बड़ा वर्ग यह मानता है कि जब तक सरकारें जातीय समीकरण पर टिकी रहेंगी, मूल समस्याओं का समाधान दूर की संभव नहीं है. अब असली परीक्षा 11 नवंबर को होगी जब मतदाता तय करेंगे कि उनकी पहली प्राथमिकता जाति है या फिर विकास का रास्ता. शेरघाटी की जनता किसे विजयी बनाती है, यह चुनावी नतीजे ही बतायेंगे.

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By KANCHAN KR SINHA

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