ग्राउंड रिपोर्ट: कभी नक्सलियों की गोलियों से गूंजता था गया का लुटुआ और सोनदाहा, आज वहां सुनाई देती है विकास की आहट
बिहार के नक्सल प्रभावित इलाकों में शुमार गया जिले का इमामगंज विधानसभा क्षेत्र आज अपनी एक नई कहानी लिख रहा है. लुटुआ, सोनदाहा, छकरबंधा, परसाचुआं और नागोबार जैसे इलाके, जिन्हें कभी नक्सलियों का अभेद्य गढ़ माना जाता था.
गया. बिहार के नक्सल प्रभावित इलाकों में शुमार गया जिले का इमामगंज विधानसभा क्षेत्र आज अपनी एक नई कहानी लिख रहा है. लुटुआ, सोनदाहा, छकरबंधा, परसाचुआं और नागोबार जैसे इलाके, जिन्हें कभी नक्सलियों का अभेद्य गढ़ माना जाता था, वहां अब शांति और तरक्की ने दस्तक दे दी है. 1980 के दशक में इन जंगलों और पहाड़ों में जहां सिर्फ गोलियों की आवाज गूंजती थी, वहीं आज चौड़ी सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां और स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई की गूंज सुनाई देती है. यह बदलाव रातों-रात नहीं हुआ है, बल्कि यह सुरक्षा बलों की मजबूत रणनीति और धरातल पर उतरी सरकारी योजनाओं का नतीजा है.
एक समय शाम होते ही पसर जाता था सन्नाटा
एक दौर था जब इन इलाकों में नक्सलियों का खौफ इस कदर हावी था कि शाम ढलते ही लोग अपने घरों में दुबक जाते थे. वर्ष 1981 में सोनदाहा गांव के चपरवार टोला के रहने वाले जमींदार दासु सिंह की हत्या और उसके बाद त्रिवेणी सिंह की हत्या ने इलाके में नक्सलियों की खौफनाक मौजूदगी दर्ज कराई थी. इसके बाद के कई दशकों तक हत्या, लूट, बारूदी सुरंगों से विस्फोट और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं यहां की नियति बन गई थीं. (फोटो: 18 फरवरी 2020 को नक्सलियों द्वारा डायनामाइट से उड़ाए गए मध्य विद्यालय सोनदाहा का भवन और उसके बगल में बना नया विद्यालय).
सुरक्षा कैंपों ने तोड़ी नक्सलियों की कमर
इन इलाकों को लाल आतंक से मुक्त कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने कड़े कदम उठाए. क्षेत्र में सीआरपीएफ (CRPF) समेत अन्य सुरक्षा बलों के स्थायी बेस कैंप स्थापित किए गए. मैगरा, भदवर, छकरबंधा, बोधी बिगहा, सलैया सोहेल और लुटुआ में नए पुलिस थाने खोले गए. सेवरा से लेकर सोनदाहा तक लगातार चले सर्च ऑपरेशन ने नक्सलियों के हौसले पस्त कर दिए. इसके साथ ही सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ”सिविक एक्शन प्रोग्राम” ने ग्रामीणों का प्रशासन पर भरोसा कायम किया, जिससे लोगों ने नक्सलियों से दूरी बना ली. पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े नक्सली या तो मारे गए, गिरफ्तार हुए या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. तीन वर्ष पहले नागोबार के एक बड़े नक्सली कमांडर के सरेंडर ने संगठन की कमर पूरी तरह तोड़ दी.
सड़क, नेटवर्क और शिक्षा से बदली तस्वीर
आज इन गांवों की भौगोलिक और सामाजिक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. जिन पगडंडियों पर चलना मौत को दावत देना था, वहां अब पक्की और चौड़ी सड़कों का जाल बिछ चुका है. मोबाइल टावर लगने से यह पूरा इलाका डिजिटल दुनिया से जुड़ गया है. सरकारी योजनाओं का असर यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच आसान हुई है. सबसे सुखद तस्वीर शिक्षा की है, जहां स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है और बेटियां बेखौफ होकर साइकिल व स्कूटी से स्कूल जा रही हैं. जो इलाका कभी दहशत का पर्याय था, वह आज प्रभात खबर के पाठकों के लिए बदलाव की एक मिसाल बन कर सामने है. यह साबित करता है कि अगर सिस्टम की इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो खौफ के साए से भी तरक्की के रास्ते निकाले जा सकते हैं.
रिपोर्ट: प्रमोद कुमारB