अहिल्याबाई जयंती विशेष: 21 साल, 600 कारीगर और मिट्टी का रैंप, जानिए 18वीं सदी में कैसे बना था विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर

गया जी के विष्णुपद मंदिर की पहचान सिर्फ मोक्ष स्थली के रूप में नहीं है, बल्कि यह 18वीं सदी की बेजोड़ इंजीनियरिंग और बेहतरीन सप्लाइ चेन का एक जीता-जागता ‘मेगा प्रोजेक्ट’ है.

Gaya News : नीरज कुमार की रिपोर्ट. गया जी के विष्णुपद मंदिर की पहचान सिर्फ मोक्ष स्थली के रूप में नहीं है, बल्कि यह 18वीं सदी की बेजोड़ इंजीनियरिंग और बेहतरीन सप्लाइ चेन का एक जीता-जागता ‘मेगा प्रोजेक्ट’ है. आज जब हम काले ग्रेनाइट से बने इस 100 फीट ऊंचे भव्य मंदिर को देखते हैं, तो इसके पीछे जयपुर के उन 600 गुमनाम कारीगरों का पसीना है, जिन्होंने बिना किसी आधुनिक मशीन के इसे तराशा था. 31 मई को महारानी अहिल्याबाई होल्कर की जयंती है. इस खास मौके पर आइए, कारीगरों के वंशजों की जुबानी समझते हैं इस ऐतिहासिक निर्माण की पूरी कहानी.

त्रासदियों के बीच तैयार हुआ विष्णुपद का ब्लूप्रिंट

वर्ष 1766 में जब महारानी अहिल्याबाई गया आईं, तो वे स्थानीय तीर्थपुरोहितों (पंडा समुदाय) के आतिथ्य में ठहरी थीं. यह वह दौर था जब पति, ससुर और इकलौते बेटे को खोने के बाद वे मालवा साम्राज्य की बागडोर संभाल रही थीं. इन निजी त्रासदियों के बावजूद उनका विजन बिल्कुल स्पष्ट था. अपने प्रवास के दौरान उन्होंने सिर्फ पूजा-पाठ नहीं किया, बल्कि पुरोहितों के सहयोग से पुराने मंदिर के जीर्णोद्धार का पूरा ढांचा तैयार किया और अपने शासनकाल में इस 21 साल लंबे प्रोजेक्ट को मूर्तरूप दिया.

विष्णुपद मंदिर का प्रांगण.

सात पहाड़ों के पत्थरों की हुई थी टेस्टिंग

प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए राजस्थान (जयपुर) से 300 परिवारों के करीब 1000 लोगों को गया लाया गया. इनमें 600 दक्ष कारीगर थे. मंदिर निर्माण में लगे मुख्य कारीगर हीरालाल गौड़ के वंशज लकी कुमार गौड़ बताते हैं कि निर्माण से पहले पत्थरों की कड़ी टेस्टिंग हुई थी. बथानी के तिलासन, बजना, परजीत, तमड़ा और हंसराज सहित कुल सात पहाड़ों के पत्थरों की जांच की गई. इसके बाद पत्थरकट्टी पहाड़ के ‘चिमड़ा’ (लंबे समय तक टिकने वाले और न टूटने वाले) काले ग्रेनाइट को इस भव्य निर्माण के लिए चुना गया.

लोहे की गुल्ली और छेनी-हथौड़े से काटी गईं चट्टानें

इतने भारी पत्थरों को 100 फीट की ऊंचाई तक ले जाना आज के दौर में भी एक पहेली लगता है. गौड़ परिवार की पीढ़ियों में दर्ज इतिहास के मुताबिक, लोहे की गुल्ली और छेनी-हथौड़े से चट्टानें काटी गईं. फिर बैलगाड़ियों और घोड़ा-गाड़ियों से इन्हें गया लाया गया.

भगवान विष्णु का चरण.

बिना मशीन ऐसे पहुंचाए गए भारी पत्थर

  • ऊंचाई तक पत्थरों को पहुंचाने के लिए मंदिर के चारो तरफ मिट्टी का एक बड़ा और घुमावदार ढलान (रैंप) बनाया गया था.
  • लकड़ी के बेलन (रोलर्स) के सहारे भारी पत्थरों को ऊपर खींचा गया.
  • पत्थरों को चमकाने के लिए किसी तरह की पॉलिश का इस्तेमाल नहीं हुआ.
  • जिस स्वरूप में पत्थर कटे, उसी में एक विशेष ‘दथा लेप’ (मसाले) के साथ उन्हें मजबूती से सेट कर दिया गया.

डकैती का खौफ और 90 प्रतिशत कारीगरों का पलायन

1787 में जब यह ऐतिहासिक काम पूरा हुआ, तो महारानी ने इन कारीगरों को गया के पत्थरकट्टी में ही बसा दिया. यह गया में एक नई ‘आर्टिजन इकोनॉमी’ (Artisan Economy) की शुरुआत थी. लेकिन दुर्भाग्य से यह विरासत अपना पूरा वजूद नहीं बचा सकी. 19वीं सदी में इस इलाके में डकैती और लूटपाट इतनी बढ़ गई कि खौफ के मारे 90 प्रतिशत कारीगर वापस जयपुर लौट गए. हीरालाल गौड़, अमरनाथ और दीनानाथ गौड़ जैसे कुछ परिवारों के वंशज आज भी किसी तरह इस ऐतिहासिक कला को जिंदा रखे हुए हैं. सरकार ने कारीगरों का पलायन रोकने और कला को बढ़ावा देने के लिए बाद में यहां एक प्रशिक्षण केंद्र भी खोला था, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण वह भी अब बंद पड़ा है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Pranjal pandey

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >