दरभंगा झरनी लोकनृत्य: नगर पंचायत कमतौल अहियारी के वार्ड 11 में इन दिनों झरनी लोकनृत्य की धूम है. विश्वकर्मा पूजा के मौके पर आयोजित इस पारंपरिक नृत्य को देखने के लिए दूर-दराज से भी लोग पहुंच रहे हैं. शुक्रवार को ढोल-मादल की थाप पर कलाकारों ने गोल घेरा बनाकर झरनी नृत्य की प्रस्तुति दी तो पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा. कलाकारों के लयबद्ध कदम और हाथों की भाव-भंगिमा ने दर्शकों का ध्यान खींचा.
ढोल-मादल की थाप पर कलाकारों ने बांधा समां
झरनी नृत्य की प्रस्तुति के दौरान कलाकार पारंपरिक अंदाज में गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं. ढोल-मादल की थाप के साथ कदमों और हाथों की लयबद्ध गति ने कार्यक्रम में अलग माहौल बना दिया.
नृत्य देखने पहुंचे लोगों ने कलाकारों की प्रस्तुति की सराहना की. स्थानीय स्तर पर आयोजित इस कार्यक्रम में दूर-दराज से भी कला प्रेमी पहुंचे और पारंपरिक लोकनृत्य का आनंद लिया.
बुजुर्ग बोले- पुरखों की पहचान है यह नृत्य
स्थानीय बुजुर्ग राजगीर महतो, राजेंद्र महतो और रामबहादुर महतो ने बताया कि झरनी नृत्य उनके पुरखों की पहचान रहा है. उनके अनुसार, पहले क्षेत्र के कई गांवों में इस तरह के लोकनृत्य आयोजित होते थे, लेकिन अब इसे जानने और प्रस्तुत करने वाले लोगों की संख्या कम होती जा रही है.
बुजुर्गों का कहना है कि नयी पीढ़ी के बीच इस लोककला को पहुंचाने की जरूरत है, ताकि पारंपरिक नृत्य की पहचान बनी रहे.
आधुनिकता के बीच संरक्षण की चिंता
कला प्रेमियों के अनुसार आधुनिकता के दौर में झरनी लोकनृत्य धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है. कलाकारों को पर्याप्त मंच और नयी पीढ़ी को प्रशिक्षण नहीं मिलने से इसके भविष्य को लेकर चिंता बनी हुई है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर लोककलाओं को नियमित मंच और प्रशिक्षण मिले तो युवा पीढ़ी भी पारंपरिक नृत्य से जुड़ सकती है.
राजकीय लोकनृत्य की सूची में शामिल करने की मांग
वार्ड पार्षद अभिषेक कुमार सहित स्थानीय कलाकारों ने कला एवं संस्कृति विभाग से झरनी नृत्य के संरक्षण के लिए पहल करने की मांग की है. उनकी मांग है कि इसे राजकीय लोकनृत्य की सूची में शामिल करने पर विचार किया जाए.
इसके साथ ही स्कूल-कॉलेजों में झरनी नृत्य की कार्यशालाएं आयोजित करने और कलाकारों को प्रोत्साहन राशि देने की मांग भी की गयी है. स्थानीय कलाकारों का कहना है कि इससे नयी पीढ़ी को इस पारंपरिक कला से जोड़ने में मदद मिल सकती है.
समय रहते पहल नहीं हुई तो मुश्किल होगी
स्थानीय कला प्रेमी सह गायक सुखदेव महतो ने कहा कि झरनी नृत्य क्षेत्र की पुरानी लोक परंपरा से जुड़ा है. उनके अनुसार, अगर समय रहते इसके संरक्षण और कलाकारों को प्रोत्साहन देने की दिशा में पहल नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में यह लोककला सीमित होकर रह सकती है.
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