1966 से अब तक मैथिली में 47 पुरस्कार

1966 से अब तक मैथिली में 47 पुरस्कार1965 में शामिल होने के बाद से तीन वर्ष नहीं मिला पुरस्कार – अब तक सर्वाधिक 11 पुरस्कार कविता व कहानी को- दूसरे स्थान पर उपन्यास व महाकाव्य की पुस्तकेंदरभंगा. साहित्य अकादमी, नई दिल्लीमे मैथिली को 1965 में जोड़े जाने के 50 साल बाद अब तक तीन बार […]

1966 से अब तक मैथिली में 47 पुरस्कार1965 में शामिल होने के बाद से तीन वर्ष नहीं मिला पुरस्कार – अब तक सर्वाधिक 11 पुरस्कार कविता व कहानी को- दूसरे स्थान पर उपन्यास व महाकाव्य की पुस्तकेंदरभंगा. साहित्य अकादमी, नई दिल्लीमे मैथिली को 1965 में जोड़े जाने के 50 साल बाद अब तक तीन बार छोड़ कर हर साल पुरस्कार प्रदान किया जा रहा है. अकादमी में शामिल होने के अगले वर्ष से ही इस भाषा में पुरस्कार देना आरम्भ किया गया. तब से लेकर 1915 तक 47 पुस्तकों को पुरस्कृत किया जा चुका है. इस बीच तीन वर्ष 1967, 1972 एवं 1974 में किसी भी मैथिली पुस्तक का चयन पुरस्कार के लिए नहीं किया गया. अब तक सर्वाधिक 11 पुरस्कार कविता वह कहानी की किताब को दिया गया है. वहीं उपन्यास व महाकाव्य की 7-7, संस्मरण की 4, आलोचना व निबंध की 2-2 और आत्मकथा, एकांकी तथा दर्शन की 1-1 पुस्तकें अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत की गई हैं. पहला पुरस्कार यशोधर झा को उनकी दर्शन की पुस्तक ‘मिथिला वैभव’ (1966) के लिए दिया गया। इसके बाद बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ को कविता संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ (1968), उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’ को उपन्यास ‘दू पत्र’ (1969), काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ को महाकाव्य ‘राधा विरह’ (1970), आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ को काव्य-संग्रह ‘पयस्विनी’ (1971), ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ को उपन्यास ‘नैका बनिजारा’ (1973), गिरीन्द्र मोहन मिश्र को संस्मरण ‘किछु देखल किछु सुनल’ (1975), बैद्यनाथ मल्लिक ‘विधु’ को महाकाव्य ‘सीतायन’ (1976), राजेश्वर झा को आलोचना की पुस्तक ‘अवहट्ठक उद्भव ओ विकास’ (1977), उपेन्द्र ठाकुर ‘मोहन’ को कविता-संग्रह ‘बाजि उठल मुरली’ (1978), तंत्रनाथ झा का महाकाव्य ‘कृष्णचरित’ (1979), सुधांशु शेखर चौधरी को उपन्यास ‘ई बतहा संसार’ (1980), मार्कण्डेय प्रवासी को महाकाव्य ‘अगस्त्यायिनी’ (1981), लिली रे को उपन्यास ‘मरीचिका’ (1982), चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ को आलोचना ‘मैथिली पत्रकारिता का इतिहास’ (1983), आरसी प्रसाद सिंह को कविता-संग्रह ‘सूर्यमुखी’ (1984), हरिमोहन झा को आत्मकथा ‘जीवन यात्रा’ (1985), सुभद्र झा को निबन्ध-संग्रह ‘नातिक पत्रक उत्तर’ (1986), उमानाथ झा को कथा-संग्रह ‘अतीत’ (1987), मायानन्द मिश्र को उपन्यास ‘मंत्रपुत्र’ (1988), कांचीनाथ झा ‘किरण’ को महाकाव्य ‘पराशर’ (1989), प्रभास कुमार चौधरी को कहानी संगह ‘प्रभासक कथा’ (1990), रामदेव झा को एकांगी-संग्रह ‘पसिझैत पाथर’ (1991), भीमनाथ झा को निबन्ध संग्रह ‘विविधा’ (1992), गोविन्द झा को कथा-संग्रह ‘सामाक पौती’ (1993), गंगेश गुंजन को कहानी-संग्रह ‘उचित वक्ता’ (1994), जयमन्त मिश्र को कविता-संग्रह ‘कविता कुसुमांजलि’ (1995), राजमोहन झा को कथा-संग्रह ‘आइ काल्हि परसू’ (1996), कीर्त्तिनारायण मिश्र को कविता-संग्रह ‘ध्वस्त होइत शांति स्तूप’ (1997), जीवकान्त को कविता-संग्रह ‘तकैत अछि चिड़ै’ (1998), साकेतानंद को कहानी-संग्रह ‘गणनायक’ (1999) और रमानंद रेणु को कविता-संग्रह ‘कतेका रास बात’ (2000) के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिया गया. यह क्रम आगे भी चलता रहा और बबुआजी झा ‘अज्ञात’ को महाकाव्य ‘प्रतिज्ञा पाण्डव’ (2001), सोमदेव को कविता संग्रह ‘सहस्रमुखी चौकपर’ (2002), नीरजा रेणु को कथा-संग्रह ‘ऋतंभरा’ (2003), चंद्रभानु सिंह को महाकाव्य ‘शकुंतला’ (2004), विवेकानंद ठाकुर को कविता-संग्रह ‘चानन घन गछिया’ (2005), विभूति आनंद को कथा-संकलन ‘काठ’ (2006), प्रदीप बिहारी को कथा-संग्रह ‘सरोकार’ (2007), मंत्रेश्वर झा को संस्मरण ‘कतेक डारिपर’ (2008), मनमोहन झा का कथा-संग्रह ‘गंगा पुत्र’ (2009), उषाकिरण खाँ को उपन्यास ‘भामती’ (2010), उदयचंद्र झा ‘विनोद’ को कविता-संग्रह ‘अपक्ष’ (2011), शेफालिका वर्मा को संस्मरण ‘किस्त-किस्त जीवन’ (2012), सुरेश्वर झा को संस्मरण ‘संघर्ष आ सेहंता’ (2013) के लिए पुरस्कृत किया जा चुका है. विगत वर्ष आशा मिश्र को उपन्यास ‘उचाट’ (2014) के लिए पुरस्कार प्रदान किया गया. अब मनमोहन झा को उनकी कहानी संग्रह ‘खिस्सा’ (2015) के लिए पुरस्कृत करने केलिए चुना गया है. साहित्य अकादमी इन मूल पुस्तकों के अलावा अनुवाद, बाल व युवा पुरस्कार भी मैथिली में प्रदान करता है.

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