नदी तालाबों में कम दिखे लोग, घर में ही मनाया छठ

नदी तालाबों में कम दिखे लोग, घर में ही मनाया छठ जाले . एक अनुष्ठान के रुप में मनाया जाने वाला छठ महापर्व बुधवार को श्रद्धापूर्वक मनाया गया. विभिन्न गांव में लोगों ने अपने घर के आंगन में गड्ढ़ा खोदा, उसमें पॉलीथीन के ऊपर पानी डालकर कृत्रिम तालाब का निर्माणकर उसी में स्नान किया और […]

नदी तालाबों में कम दिखे लोग, घर में ही मनाया छठ जाले . एक अनुष्ठान के रुप में मनाया जाने वाला छठ महापर्व बुधवार को श्रद्धापूर्वक मनाया गया. विभिन्न गांव में लोगों ने अपने घर के आंगन में गड्ढ़ा खोदा, उसमें पॉलीथीन के ऊपर पानी डालकर कृत्रिम तालाब का निर्माणकर उसी में स्नान किया और भगवान सूर्य को अर्घ दिया़ चारो ओर तालाब ही तालाब रहने के बावजूद यहां के तालाबों में व्याप्त कुव्यवस्था के कारण लोगों को आवासीय परिसर में ही छठ करना अब मजबूरी हो गया है़ रतनपुर के रजखानी तालाब में जेसीबी से बेतरतीब मिट्टी की खुदाई से पिछले वर्ष घाट निर्माण के दौरान एक किशोर की मौत डूबने से हो गयी थी़ इस कारण इस वर्ष रजखानी सूनसान दिखा़ मिथिला के राजा शिव सिंह द्वारा निर्मित एक सौ पच्चीस बीघे का रजोखर पोखर जिसका पनियाव पच्चासी बीघे का है, के घाट अतिक्रमण एवं तालाब में मखाना की खेती की वजह से उस झीलनुमा तालाब में काफी कम संख्या में आस-पास के ही लोग वहां पहुंचे़ तालाबों का गंदा पानी देख शहरी माहौल में रहने वाले बच्चे घाट बनाने के ही वक्त अपना नाक-भौंहे सिकोड़ने लगे थे़ तालाबों के पानी से आने वाली दुर्गन्ध के कारण वे अपना पैर भी पानी में डालना गुनाह समझ रहे थे़ पानी से आने वाली दुर्गंध का कारण के संबंध में पूछे जाने पर वहां के लोगों ने बताया कि इलाके के अधिकत्तर तालाबों में मखाना की खेती होती है़ मखाना निकालते वक्त मछुआरों द्वारा उसके पत्ता को तालाब में ही सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है़ इसी कारण पानी से सड़ांध दुर्गंध आना बताया है़ इस पर्व को लेकर दूर-दराज के शहरों से आये लोग गांव में आकर ग्रामीण वातावरण में राहत की सांस तो लेते हैं, मगर शहरों के तंग गलियों में रहने वाले उनके बच्चे गांव का खुला-खुला मैदान व स्वच्छ वातावरण में अत्यधिक पटाखा जलाकर वातावरण को प्रदूषित भी करते हैं. बच्चे तो बच्चे हैं बड़ों भी उनके सहयोग में लगे दिखे़ जबकि उन्हीं बच्चों के द्वारा शहरों के उनके विद्यालयों में वतावरण प्रदूषित करने वाले पटाखें को नहीं चलाने का संकल्प लेकर गांव आते हैं और यहां आकर उन संकल्पों को भूल जाते हैं. बुधवार की अहले सुबह लगभग तीन बजे से ही ग्रामीण इलाका पटाखों की आवाज से गूंजने लगा़

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