गरीबों के मसीहा थे डॉ गणपति मिश्र व्यावसायिक युग में टूटी सेवा भाव चिकित्सा की कड़ी दरभंगा. चिकित्सा अब सेवा नहीं रह गया है. यह पूरी तरह व्यवसाय रूप में आ गया है. इस माहौल में भी शहर के उन गिने-चुने चिकित्सकों में एक प्रमुख नाम डॉ गणपति मिश्र का हुआ करता था. रविवार की सुबह उनके आकस्मिक निधन के साथ ही सेवा भाव चिकित्सा की एक मजबूत कड़ी टूट गयी. गरीबों का मसीहा कहे जाने वाले डॉ मिश्र के नहीं रहने से सबसे बड़ा आघात आर्थिक रूप से तथाकथित विपन्न उस तबके को लगा है जो चंद पैसों के सहारे उनसे उपचार करवाते थे. सुनने में भले ही कड़वा लगे, लेकिन यह कटु सत्य है कि अब लोग एक खास आधार बनाकर चिकित्सक के पास जाते हैं. लेकिन डॉ मिश्र ऐसे चिकित्सक थे, जिनके यहां सर्वाधिक अल्पसंख्यक समुदाय के मरीज की भीड़ सुबह-शाम जुटी नजर आती थी. कम से कम जांच लिखना, सस्ती दवाई देना तथा छोटी-मोटी समस्याओं से निजात के लिए परहेज की सिफारिश करनेवाले डॉ मिश्र के यहां अधिकांश मरीज निचले तबके के ही दिखते थे. जाहिर है इस तबका ने एक मसीहा खो दिया. साहित्य से थी गहरी रुचि पेशे से चिकित्सक होने के बावजूद डॉ मिश्र का साहित्य से गहरा लगाव था. मरीजों की उपस्थिति में भी साहित्यकारों के साथ वे साहित्यिक विमर्श में डूबे नजर आ जाया करते थे. न कोई बंधन, न कोई पाबंदी कोई भी सीधे उनसे मिल सकता था. जबतक जी चाहे बैठकर साहित्यिक बातें कर सकता था. उनकी पत्नी आशा मिश्र साहित्यकार हैं. इस वर्ष उन्हें सबसे बड़े साहित्यिक संस्था साहित्य अकादेमी से पुरस्कार मिला. डॉ मिश्र की मौलिक कृति ‘हमहुं कविता लिखि लैत छी’ प्रकाशित हुई है. राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार नागार्जुन, आचार्य सुमन सहित भोगेंद्र झा आदि को एक चिकित्सक के रूप में भी सेवा देते रहे. मैथिली साहित्य की चर्चित व प्रतिष्ठित संस्था अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद के सचिव के रूप में डॉ मिश्र साहित्य को पोषित करते रहे. उदास हो गया साहित्य मंदिर लालबाग हसनचक के ठीक दक्षिण अवस्थित बाहर से दिखनेवाला वह पुराना खपरैल मकान उस जमाने की याद ताजा करता है, जब यहां राष्ट्रीय स्तर के साहित्य सेवियों का जमावड़ा लगा करता था. डॉ मिश्र के पिता स्व भैरव मिश्र के भाई शंकर मिश्र की गहरी अभिरुचि रहने का ही परिणाम रहा कि मैथिली ही नहीं अन्य भाषाओं की भी लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों से यह मकान साहित्य मंदिर में परिणत हो गया. देश के प्रथम राष्ट्रपति व महान स्वतंत्रता सेनानी डॉ राजेंद्र प्रसाद का भी आगमन इस मंदिर में हो चुका था. अपने चाचा की विरासत को क्रमश: संभालते हुए थाती के रूप में डॉ मिश्र आगे लिये चल रहे थे. अचानक इनके निधन से यह मंदिर उदास हो गया है. साथ ही साहित्य सृजकों के मन में यह बात उठने लगी है कि अब इस थाती को कौन आगे ले जायेगा. फिलहाल तो कोई इनसा नहीं दिख रहा. अंतिम दर्शन को लगा रहा तांता लक्ष्मीसागर स्थित आवास पर डॉ मिश्र के अंतिम दर्शन के लिए दिन भर शुभेच्छुओं का तांता लगा रहा. साहित्य अकादेमी में मैथिली के प्रतिनिधि डॉ वीणा ठाकुर, डॉ दिलीप झा, डॉ प्रभाकर पाठक, शिवाकांत पाठक, संजय सरावगी, हीरेंद्र झा, अमलेंदु शेखर पाठक, परमेश्वर सरावगी, डॉ अमरकांत कुंवर, डॉ सतीश कुमार सिंह, युगल खेडि़या, अजय कुमार जालान, अब्दुल हादी सिद्दिकी, अशोक कुमार पोद्दार, दिलीप कुमार शर्मा, डीएमसीएच के मेडिसीन विभागाध्यक्ष डॉ बीके सिंह, प्रख्यात चिकित्सक डॉ सीएम झा, डॉ डीएन झा, डॉ विनयानंद झा, डीएमसीएच अधीक्षक डॉ संतोष कुमार मिश्र, मैथिली अकादमी के पूर्व अध्यक्ष कमलाकांत झा, सहित सैंकड़ों की संख्या में पहुंचे लोगों ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धा निवेदित की. इधर विद्यापति सेवा संस्थान में महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू, कार्यकारी अध्यक्ष बुचरू पासवान, जीवकांत, चंद्रशेखर झा बूढ़ाभाई, चंद्रमोहन झा पड़वा, विष्णुदेव झा, विनोद कुमार झा सहित अन्य ने दो मिनट का मौन रख दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की. बता दें कि डॉ मिश्र का अंतिम संस्कार सोमवार को किया जायेगा.
गरीबों के मसीहा थे डॉ गणपति मश्रि
गरीबों के मसीहा थे डॉ गणपति मिश्र व्यावसायिक युग में टूटी सेवा भाव चिकित्सा की कड़ी दरभंगा. चिकित्सा अब सेवा नहीं रह गया है. यह पूरी तरह व्यवसाय रूप में आ गया है. इस माहौल में भी शहर के उन गिने-चुने चिकित्सकों में एक प्रमुख नाम डॉ गणपति मिश्र का हुआ करता था. रविवार की […]
