एक टाइम बनाती थी, तीन टाइम अपने बच्चों को खिलाती थी

दोनों बच्चों को बाहर से घर में बंद कर ट्यूशन पढ़ाने जाती थी निर्मला पति के मौत एक साल बाद घर के दहलीज को पार की थी निर्मला 20 साल के परिश्रम के बाद दोनो बेटे को मुकाम पर पहुंचा चुकि सुबह 6:30 बजे से शुरू होता था सफर और रात के 8:30 बजे पहुंचती […]

दोनों बच्चों को बाहर से घर में बंद कर ट्यूशन पढ़ाने जाती थी निर्मला

पति के मौत एक साल बाद घर के दहलीज को पार की थी निर्मला
20 साल के परिश्रम के बाद दोनो बेटे को मुकाम पर पहुंचा चुकि
सुबह 6:30 बजे से शुरू होता था सफर और रात के 8:30 बजे पहुंचती थी घर
घर से निकलने के बाद एक कमरे के मकान में बच्चों को बाहर से बंद कर देती थी ये मां
रक्सौल : 1995 में पति बिनोद कुमार गुप्ता का निधन सड़क हादसे में हो गया तब मानो निर्मला की दुनिया ही उजड़ चुकी थी. सगे-संबंधी साथ देने के बजाय परेशान करना शुरू कर दिये थे. तब निर्मला के पास एक तीन साल का बेटा विशाल गुप्ता था तो दूसरा एक साल का कुणाल. दुनिया में उनके लिए कुछ भी नहीं था. एक साल इंतजार के बाद निर्मला गुप्ता ने अपने बच्चों को बेहतर परवरिश के लिए एक निजी विद्यालय में शिक्षा देने का काम शुरू किया.
उस समय विद्यालय से इतनी कम रकम मिलती थी निर्मला गुप्ता आज भी बताने में शर्मा जाती है. इन पैसों से घर का काम नहीं चलता था तो उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. तब निर्मला गुप्ता का सफर सुबह के 6:30 में शुरू होता था और रात के 8:30 में खत्म होता था. वे सुबह 5 बजे जगती थी और घर का काम पूरा करने के बाद निकल जाती थी.
कई घरों में ट्यूशन पढ़ाने के बाद वह स्कूल जाती थी और स्कूल के बाद फिर कई घरों में ट्यूशन पढ़ाती थी. रात को 8:30 में घर पहुंचती थी. निर्मला बताती है कि वह एक टाइम रात में खाना बनाती थी और खुद व अपने बच्चों को उसी खाना को तीन टाइम खिलाती थी. जिंदगी में संघर्ष करते हुए उन्होंने अपने दोनो बेटों का बेहतर परवरिश किया और उन्हे बेहतर संस्कार भी दिया.
भावुक होते हुए उन्होंने बताया कि जब वह बाहर पढ़ाने जाती थी अपने दोनो बच्चों को अपने एक कमरे के मकान में बाहर से ताला लगा कर जाती थी. क्योंकि उनके बच्चों की देख-रेख करने वाला कोई और नहीं था. उनका बड़ा बेटा विशाल गुप्ता ओरेटल कंपनी में सिनियर सॉफ्टवेयर इंजिनीयर है तो बहू भी सॉफ्टवेयर इंजिनीयर है.
छोटा बेटा कुणाल बंधन बैंक के कलस्टर शाखा मुजफ्फरपुर में उप शाखा प्रबंधक है. आज निर्मला के घर में सब कुछ है बाबजूद वे पहले की तरह रोज स्कूल पढ़ाने जाती है. उनके जिंदगी में बदलाव यह है कि वे अब ट्यूशन नहीं पढ़ाने जाती है. आदर्श शिक्षिका के रूप में अपनी छवि बनाने वाली निर्मला को कई बड़े स्कूलों से अच्छे पगार पर काम करने का अवसर दिया गया. बाबजूद वे उसी स्कूल में आज भी पढ़ाती है जहां 20 साल पहले पढ़ाती थी.
कहती है कि अब एक दो साल पढ़ाना है और बच्चों के साथ रहना है तो साल दो साल के लिए किसी दूसरे विद्यालय में जाने का कोई मतलब नहीं है. मेहनत की मिशाल बनी निर्मला को आज सब जगह सम्मान मिलता है लेकिन जब उन्हे साथ की जरूरत थी तो उनके साथ कोई खड़ा नहीं दिखता था.
अपनी आप बिती सुनाते हुये उन्होने कहा कि जब एक कमरे के मकान को आगे बढ़ा रही थी तो वे मजदूरों की तरह काम कर रही थी और मजदूर भी उनके मेहनत को देखकर परेशान हो जाते थे. यानि सभी तरह के विषम परिस्थिति के बाद भी इस मां ने ठान लिया था कि अपने बच्चों को बेहतर बनाके रहूंगी तो उन्होंने ऐसा करके दिखाया.

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