मोतिहारी : शहर की हृदय स्थली मोतीझील संरक्षण को लेकर सरकार की मंशा ठीक नहीं है. झील का विकास राज्य एवं केंद्र सरकार के आपसी बेमेल तालमेल के पेच में फंसा है. एक तरफ केंद्र की सरकार झील विकास को तत्पर्य है तो दूसरी तरफ राज्य सरकार झील विकास की प्रक्रिया को लेकर टालमटोल की […]
By Prabhat Khabar Digital Desk | Updated at :
मोतिहारी : शहर की हृदय स्थली मोतीझील संरक्षण को लेकर सरकार की मंशा ठीक नहीं है. झील का विकास राज्य एवं केंद्र सरकार के आपसी बेमेल तालमेल के पेच में फंसा है. एक तरफ केंद्र की सरकार झील विकास को तत्पर्य है तो दूसरी तरफ राज्य सरकार झील विकास की प्रक्रिया को लेकर टालमटोल की नीति पर काम कर रही है. तभी तो फरवरी 2014 में प्राधिकार गठन के बाद भी झील विकास की राह में सरकार एक कदम भी आगे नहीं चल सकी है.
आलम यह है कि नौ माह बीत जाने के बाद भी प्राधिकार की बैठक नहीं बुलायी गयी. जिससे झील विकास की प्रक्रिया अवरूद्ध है. बड़े मुद्दत बाद जब फरवरी 2015 को प्राधिकार का गठन हुआ तो लोगों में झील सौंदर्यीकरण की एक बार फिर आस जगी थी, तब मुख्यमंत्री जितन राम मांझी थे, लेकिन सत्ता की उठा पटक के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गयी और फिर आने वाले मुख्यमंत्री का झील विकास की इस दिशा में ध्यान ही नहीं रहा.
इन चार बिंदुओं पर किया था फोकस
वेटलेंड की टीम ने मोतीझील के विकास के लिए प्राधिकार गठन को पहली प्राथमिकता दिया था. जिसे राज्य सरकार को करनी थी. इसके अलावे झील की भूमि का प्रकार खासमहाल होने को लेकर जिला प्रशासन को झील का सीमांकन करने की जिम्मेवारी सौंपी, वहीं तीसरा झील में गिर रहे औद्योगिक कचरा पर रोक लगाने एवं नाला की गंदा पानी को ट्रिटमेंट कर गिराने की व्यवस्था करने को कहा था. इसके लिए राज्य सरकार को सभी बिंदुओं के कार्य को पूरा कर जानकारी केंद्र को उपलब्ध कराना था.