न्यायालय के स्थगन आदेश की खुलेआम अवहेलना, डुमरांव में अवैध रजिस्ट्री से प्रशासन कटघरे में

न्यायालय उपन्यायाधीश-11, डुमरांव द्वारा पारित स्पष्ट स्थगन आदेश के बावजूद विवादित भूमि की रजिस्ट्री किए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है.

डुमरांव. न्यायालय उपन्यायाधीश-11, डुमरांव द्वारा पारित स्पष्ट स्थगन आदेश के बावजूद विवादित भूमि की रजिस्ट्री किए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है. इस प्रकरण में अवर निबंधक, डुमरांव पर न्यायालय के आदेश की अवहेलना, पद के दुरुपयोग और गंभीर प्रशासनिक लापरवाही के आरोप लगे हैं. मामला अर्जुनपुर निवासी 90 वर्षीय वृद्धा सोनिया देवी से जुड़ा है, जो अपने माता-पिता की एकमात्र वारिस हैं. उन्होंने वर्ष 2018 में अपने चचेरे भाई द्वारा जालसाजी, धोखाधड़ी और कूटरचना कर भूमि अपने नाम दर्ज कराए जाने के विरुद्ध सब जज-1 के न्यायालय में वाद संख्या 52/2018 दायर किया था. इस वाद में न्यायालय द्वारा दिनांक 5 जनवरी 2023 को स्थगन आदेश पारित किया गया, जो आज भी प्रभावी है. इसके बावजूद दिनांक 23 दिसंबर 2024 को स्थगित भूमि की रजिस्ट्री पियूष कुमार उपाध्याय एवं निर्भयराज द्वारा करायी गयी, जिसे शिकायतकर्ता ने पूर्णतः अवैध बताया है. चौंकाने वाली बात यह है कि उक्त भूमि पहले से ही जिला निबंधन कार्यालय की रोको सूची में दर्ज थी. वृद्धा सोनिया देवी ने अनुमंडलीय लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी, डुमरांव कुमारी मनीषा के समक्ष दर्ज शिकायत में कहा है कि इस अवैध रजिस्ट्री के कारण उन्हें गंभीर मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षति हुई है. उन्होंने आरोप लगाया कि लोक सेवक द्वारा न्यायालयी प्रक्रिया को निष्प्रभावी करने का प्रयास किया गया, जो प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है. शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि निबंधन अधिनियम की धारा 82 के अंतर्गत फर्जी बयान, कूटर दस्तावेज और छलपूर्वक निबंधन दंडनीय अपराध है. इसी क्रम में जिला अवर निबंधक, बक्सर द्वारा नगर थाना बक्सर में संबंधित पक्षकारों के विरुद्ध 25 जनवरी 2026 को प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है. वृद्धा ने अपनी अस्वस्थता का हवाला देते हुए बताया कि वे चलने-फिरने में असमर्थ हैं और उनका एकमात्र पुत्र शिवजी राय ही उनकी देखभाल करते हैं. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि संबंधित निबंधक से स्पष्टीकरण लेकर प्रशासनिक जांच करायी जाये, दोषियों की जवाबदेही तय हो तथा अवैध रजिस्ट्री के मामले में महानिरीक्षक निबंधन एवं जिलाधिकारी को अनुशंसा भेजी जाये. यह मामला न केवल न्यायालय के आदेश की अवमानना का है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि यदि प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही रही तो आम नागरिकों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ सकता है. अब देखना होगा कि लोक शिकायत निवारण अधिनियम के तहत समयबद्ध और निष्पक्ष कार्रवाई कब तक होती है.

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By AMLESH PRASAD

AMLESH PRASAD is a contributor at Prabhat Khabar.

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