Buxar News (डुमरांव से विनीत कुमार मिश्रा की रिपोर्ट): कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत बिहार में जैविक मत्स्य पालन की एक नई पहल शुरू हुई है. बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की अंगीभूत इकाई वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय, डुमरांव के सहायक प्राध्यापक-सह-कनीय वैज्ञानिक डॉ. सुदय प्रसाद ने बक्सर जिले के सम्हार गांव में किसान अक्षय कुमार के तालाब पर नीलगाय के मल का उपयोग कर मछली उत्पादन का अनूठा प्रयोग शुरू किया है.
नीलगाय का मल क्यों खास
डॉ. सुदय प्रसाद ने बताया कि नीलगाय के मल में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे प्रमुख पोषक तत्वों के साथ जिंक, आयरन और कैल्शियम भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. ये तत्व तालाब की उत्पादकता बढ़ाते हैं, पानी की गुणवत्ता सुधारते हैं और मछलियों के प्राकृतिक आहार प्लवक व सूक्ष्म जलीय जीवों के विकास में मदद करते हैं.
क्या फायदा मिल रहा है
लागत घटी: रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से मत्स्य पालन की कुल लागत घट रही है.
उत्पादन बढ़ा:प्राकृतिक भोजन मिलने से मछलियों की वृद्धि दर और उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार दिख रहा है.
पर्यावरण-अनुकूल: यह मॉडल जैविक कृषि-मत्स्य एकीकृत प्रणाली को बढ़ावा देकर प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग का उदाहरण है.
विशेषज्ञों की राय
वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. पारस नाथ ने कहा कि तकनीक सफल होने पर किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन का टिकाऊ विकल्प मिलेगा. नीलगाय के मल जैसे प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा.
वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय डुमरांव के जनसंपर्क पदाधिकारी डॉ. मजहर अंसारी ने बताया कि सफल परिणाम मिलने पर यह मॉडल बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में भी अपनाया जा सकता है. इससे जैविक मत्स्य पालन को बढ़ावा मिलेगा और किसानों की आय बढ़ेगी.
किसानों में उत्साह
क्षेत्र के किसानों और मत्स्य पालकों में इस प्रयोग को लेकर खासा उत्साह है. यह पहल न केवल ‘खेत बचाओ अभियान’ के उद्देश्यों को मजबूती दे रही है, बल्कि टिकाऊ कृषि व मत्स्य पालन की नई संभावनाएं भी खोल रही है.
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