ब्रह्मपुर (बक्सर) से संतोष कांत की रिपोर्ट
Bihar Panchayat Election 2026 : बिहार में वर्ष 2026 में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की प्रशासनिक और राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर पहुंच चुकी हैं. सीवान जिला में आरक्षण की नई व्यवस्था को लेकर उपजे संशय के बाद अब बक्सर जिले के ग्रामीण इलाकों में भी सियासी सस्पेंस गहरा गया है.
जिला मुख्यालय से लेकर सुदूर गांवों की चौपालों, चाय की दुकानों और दालानों में इन दिनों सिर्फ एक ही सवाल तैर रहा है इस बार हमारी सीट सुरक्षित बचेगी या आरक्षण का चक्रव्यूह पूरा समीकरण ही बदल देगा. पंचायती राज विभाग और राज्य निर्वाचन आयोग के कड़े निर्देशों के आलोक में बक्सर जिला प्रशासन द्वारा त्रिस्तरीय पंचायतों (मुखिया, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य और सरपंच) के लिए आरक्षण रोस्टर को नए सिरे से तैयार करने की कवायद युद्धस्तर पर शुरू कर दी गई है. इस बार रोटेशन प्रणाली के सख्त पालन के कारण जिले के कई राजनीतिक सूरमाओं और स्थापित चेहरों के भविष्य पर तलवार लटकती दिख रही है.
क्यों उड़ी है मौजूदा जनप्रतिनिधियों की नींद?
बिहार पंचायती राज अधिनियम के तहत चुनावी व्यवस्था में यह साफ प्रावधान है कि कोई भी सीट स्थायी रूप से किसी एक वर्ग या जाति के लिए आरक्षित नहीं रखी जा सकती. नियमतः हर दो चुनाव के बाद सीटों के स्वरूप में बदलाव (रोटेशन) अनिवार्य है.
बक्सर जिले के सिमरी, राजपुर, ब्रह्मपुर, डुमराव और नावानगर जैसे बड़े प्रखंडों में, जहां पिछले दो कार्यकाल से एक ही वर्ग, जाति या व्यक्ति का दबदबा कायम था, वहां इस बार बड़ा उलटफेर होना तय माना जा रहा है. यदि कोई सीट पिछले चुनाव में सामान्य (अनारक्षित) थी या किसी विशेष आरक्षित वर्ग के पास थी, तो इस बार चक्रीकरण पद्धति के तहत उसका किसी दूसरे वर्ग या महिला के खाते में जाना निश्चित है. यही कारण है कि जो मुखिया पिछले पांच साल से क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत मानकर चल रहे थे, आज वे जिला कलेक्ट्रेट के पंचायती राज कार्यालय का चक्कर काटते नजर आ रहे हैं.
आधी आबादी का दिखेगा दबदबा, पुरुषों को ‘प्लान-बी’ का सहारा
बिहार में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का प्रावधान है. बक्सर जिले की कुल 142 ग्राम पंचायतों में से आधी सीटें सीधे तौर पर महिलाओं के लिए आरक्षित की जा रही हैं. इस नियम ने जिले के कई धुरंधर पुरुष उम्मीदवारों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. जिन उम्मीदवारों को अंदेशा है कि उनकी पारंपरिक सीट इस बार महिला आरक्षित हो सकती है, उन्होंने आनन-फानन में अपना ‘प्लान-बी’ सक्रिय कर दिया है.
मैदान से बाहर होने के डर से इन नेताओं ने अब खुद के बजाय अपनी पत्नी, मां, बहू या परिवार की किसी अन्य महिला सदस्य के नाम को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है. कई गांवों में तो पुरुष नेता खुद पीछे रहकर महिलाओं के नाम पर जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं, ताकि पंचायत की सत्ता पर उनके परिवार का कब्जा बरकरार रहे.
प्रखंडवार स्थिति: कहां कितना होगा असर?
बक्सर जिले के प्रशासनिक ढांचे के अनुसार, कुल 11 प्रखंडों में पंचायतों की स्थिति कुछ इस प्रकार है, जहां नए रोस्टर का सबसे व्यापक और सीधा असर देखने को मिलेगा:
सिमरी प्रखंड : जिले में सर्वाधिक पंचायतें होने के कारण यहाँ सबसे बड़े फेरबदल और नए चेहरों के आने की उम्मीद है.
राजपुर प्रखंड : जातीय समीकरण और वर्गवार जनसांख्यिकी के आधार पर यहाँ कई सीटें आरक्षित होंगी.
ब्रह्मपुर प्रखंड : कई पुराने और कद्दावर चेहरों की सीटें इस बार महिलाओं या EBC वर्ग के खाते में जा सकती हैं.
बक्सर, डुमराव, नावानगर : शहरी सीमा से सटे होने और नए परिसीमन के कारण यहाँ शहरी और ग्रामीण मतदाताओं का संतुलन बदलेगा.
इटाढ़ी, चौसा : नए रोस्टर के लागू होने से इस क्षेत्र में युवाओं को चुनावी मैदान में उतरने का बड़ा मौका मिलेगा.
चौगाई, चक्की, केसठ : छोटे प्रखंड होने के कारण यहाँ एक-एक सीट प्रतिष्ठा की लड़ाई बनेगी, जहां कांटे की टक्कर तय है.
आबादी का नया डेटा तय करेगा सीटों का भाग्य
प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जिले में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) की आबादी के नए और संशोधित आंकड़ों के आधार पर ही वर्गवार सीटों का वर्गीकरण किया जा रहा है. बक्सर के जिन क्षेत्रों या वार्डों में पिछले कुछ वर्षों में जनसांख्यिकी में बदलाव आया है या जहां आरक्षित वर्गों की आबादी बढ़ी है, वहां सीटों का आरक्षित स्वरूप बदलना तय है. इसके लिए हर प्रखंड के सांख्यिकी विभाग से डेटा का मिलान किया जा रहा है ताकि किसी भी स्तर पर त्रुटि न रहे.
पड़ोसी पंचायतों पर भी टिकी हैं नजरें
सस्पेंस के इस माहौल में जिले के कई चतुर राजनेताओं ने एक और अनूठी रणनीति अपनाई है. यदि किसी स्थापित नेता को लगता है कि उसकी गृह पंचायत उसके वर्ग के अनुकूल नहीं रहने वाली है, तो उसने अभी से अपनी रिश्तेदारी या प्रभाव वाली पड़ोसी पंचायतों में जमीन तलाशनी शुरू कर दी है. इसके लिए वे पड़ोसी पंचायतों के सामाजिक और विकास कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, ताकि वक्त आने पर वहां से पर्चा दाखिल किया जा सके.
फिलहाल, जब तक बक्सर जिला प्रशासन द्वारा अंतिम आरक्षण रोस्टर की आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं कर दी जाती, तब तक संभावित उम्मीदवारों की धड़कनें यूं ही बढ़ती-घटती रहेंगी. बक्सर की ग्रामीण राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह आने वाले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार का चुनाव कई पुराने साम्राज्यों को ढहाने और कई नए चेहरों को स्थापित करने वाला साबित होगा.
