बक्सर. लोक आस्था का चार दिवसीय महापर्व शनिवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया. पहले दिन संकल्प के साथ व्रतियों ने नहाय-खाय के साथ व्रत का अनुष्ठान किया. सूर्य उपासना का यह लोक पर्व कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है. छठ के दूसरे दिन रविवार को खरना का व्रत रखा जायेगा. तीसरे दिन सोमवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ दिया जायेगा, जबकि चौथे और आखिरी दिन मंगलवार को उदीयमान सूर्य को अर्घ देकर व्रत का पारण होगा.
भगवान सूर्य को समर्पित है पर्व
हिंदू धर्म में छठ पूजा का विशेष महत्व होता है. यह पूजा भगवान सूर्य एवं छठी मइया को समर्पित होता है. इस व्रत में सूर्यदेव और छठी मइया की विशेष रूप से पूजा-आराधना की जाती है. इसके तहत पूरे विधि-विधान के साथ उपवास रखकर उगते और डूबते हुए सूर्य को अर्घ दिया जाता है. नहाय-खाय को लेकर व्रती महिलाओं ने गंगा अथवा अन्य नदियों और सरोवर में स्नान किया. इसके बाद व्रती घर लौटे और मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से कद्दू की सब्जी, चने की दाल व अरवा चावल का प्रसाद पकाये तथा भगवान सूर्य को भोग लगाकर खुद के साथ सगे-संबंधियों को खिलाये.
नहाय-खाय का महत्व
ज्योतिषाचार्य पं मुन्ना जी चौबे ने बताया कि छठ में नहाय-खाय का खास महत्व होता है. छठ महापर्व का पहला दिन नहाय-खाय कहलाता है. इस दिन व्रत चार दिनों तक चलने वाले व्रत का संकल्प लिया जाता है तथा मन और शरीर को शुद्ध करते हुए व्रत और पूजा-अर्चना का शुभारंभ किया जाता है. क्योंकि, भगवान भास्कर की आराधना में पवित्रता का विशेष ख्याल रखना अनिवार्य होता है.
खरना के बाद शुरू होगा निर्जला उपवास
खरना का व्रत रविवार को किया जायेगा. व्रती गंगा अथवा नदी या तालाबों में पावन स्नान करेंगे तथा चावल, दूध व गुड़ मिश्रित खीर एवं रोटी का प्रसाद बनाकर भगवान सूर्य को भोग लगायेंगे. इसके बाद प्रसाद ग्रहण कर 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू करेंगे.
डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
