Buxar News: अष्टमी की रात में निशा पूजा कर मांगा सुख-शांति का आशीर्वाद

राजनीतिक कारणों से वर्ग विभेद कर सत्ता पाने का सूत्र गढ़ने वालों को नवरात्र एकता का अक्षुण्ण संदेश दिया

चक्की .

राजनीतिक कारणों से वर्ग विभेद कर सत्ता पाने का सूत्र गढ़ने वालों को नवरात्र एकता का अक्षुण्ण संदेश दिया. चैत्र नवरात्र की महाअष्टमी का जागरण भक्तों को अपने आगोश में समेट लिया. यह जन जागरण सनातनियों को बिखरने नहीं देगा. इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरुप माता महागौरी की पूजा की जाती है.

मान्यता है कि अष्टमी कि रात में निशा पूजा करने से सर्व मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. अनुमंडल के विभिन्न प्रखंड सहित उसके आसपास के गांवों की गलियां शनिवार की रात ””””निमियां की डाढ़ मइया लावेली झुलुहवा”””” सहित अन्य पारंपरिक देवी गीतों से गूंजती रहीं. मौका था नवरात्र की अष्टमी तिथि निशा पूजा की. श्रद्धा के साथ हुई पूजा : परंपरा के अनुसार विशेष विधि से होने वाली देवी की निशा रूप की पूजा शनिवार की रात्रि में श्रद्धा एवं हर्षोल्लास की गई. शक्ति, मंगल और एकता के सूत्र में बांधने वाली इस पूजा में महिलाएं सारी रात जागकर निशा पूजा करती है. चैत्र मास की अष्टमी तिथि को शाहाबाद क्षेत्र के साथ संपूर्ण पूर्वी भारत में सर्व मनोकामना पूर्ण होने के लिए महिलाएं पूरी रात जागकर मां शक्ति स्वरूपणी निशा की पूजा आराधना करती हैं. हर वर्ग के लोग होते हैं पूजा में शामिल: इस पूजा में खास बात यह होती है कि सबकी अपनी-अपनी भूमिका अहम होती है. सबसे पहले भूमिका बाल्मीकि समाज की शुरू होती है. क्योंकि इनके द्वारा ही घरों के दरवाजे पर डगर (डफली के आकृति वाला वाद्ययंत्र) एवं श्रृंगा (रणक्षेत्र में बजने वाला दुदुंभी) बजाकर सायं काल में देवी की आगमन कराई जाती है. पुराणों के अनुसार मान्यता हैं कि इस दिन माता श्रृंगा की धुन पर ही घर में प्रवेश करती हैं. इसके बाद ही घरों में पूजा की तैयारियां शुरू होती है. पूजा के दौरान दउनी (नए वस्त्र) अर्पण कर माता की कलश स्थापना होती है. मालाकारों द्वारा दिए गए पुष्पों से माता रानी का श्रृंगार किया जाता है. इस दौरान श्रृंगार के साथ हार, फूल से माता को सजाया जाता है. इसके बाद माता को विधि विधान से पूजा अर्चन कर परिवार सहित नगर कि सुख शांति की कामना की जाती है. पूजा का प्रसाद भी खेतों में उपजे हुए नये अन्न से तैयार होता है. इसमें गेहूं, चना, दाल से बनी पूरियां मुख्य रूप से शामिल होती हैं. पूजा के दौरान रोम-रोम पुलकित करने वाली देवी गीतों से नगर सहित गांव की गलियां गूंजती रहती हैं. रविवार को अहले सुबह डगर एवं श्रृंगा बजाकर देवी की पूजा पाठ कर विदाई की गई. माना जाता है कि माता की विदाई भी सुबह डगर एवं श्रृंगा के धुन पर ही होती है. अष्टमी के दिन ही श्रद्धालुओं द्वारा निशा पूजा के साथ व्रत भी रखा गया था. रविवार की अहले सुबह माता कि विदाई के दौरान महिलाओं द्वारा मां काली, दूर्गा मंदिर व घर में कच्चे दूध से कराह देने के उपरांत व्रत करने वाली महिलाओं ने पारण के साथ प्रसाद ग्रहण किया. इस संबंध में पूजा करने वाली मनीषा देवी, ज्योति देवी, बबिता देवी, सीमा देवी, बिंदु देवी, सरिता देवी, किरण देवी, हिरन देवी, डॉली देवी, पिंकी कुमारी आंचल, लक्ष्मी सहित अन्य महिलाओं ने बताया कि खास कर शाहाबाद के क्षेत्र सहित संपूर्ण पूर्वी भारत में अष्टमी तिथि की रात में मां निशा की पूजा सदियों से होती आ रही है. यह विशेष पूजा हमलोगों को विरासत में मिली हुई परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अष्टमी की निशा पूजा है.

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