वेंटिलेटर पर राजगीर का सप्तऋषि कुंड, सूखती जलधाराओं से संकट में आस्था

राजगीर के ऐतिहासिक सप्तऋषि कुंड के जलस्रोत सूख रहे हैं, जिससे धार्मिक आस्था और पर्यटन पर संकट मंडरा रहा है। जानिए क्या है इस पर्यावरणीय चिंता का मुख्य कारण।

प्रथम पृष्ठ के लिए ध्यानार्थ सिसक रही सप्तऋषि की तपोभूमि, एक-एक कर दम तोड़ रहे पवित्र झरने राजगीर की आध्यात्मिक धरोहर पर संकट, सप्तऋषि कुंड के अस्तित्व की अंतिम लड़ाई फोटो - राजगीर के सप्तऋषि कुंड के विश्वामित्र मुनि झरना प्रतिनिधि, राजगीर। आस्था, अध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत संगम माने जाने वाले राजगीर के प्राचीन गर्मजल कुंडों पर अब अस्तित्व का गंभीर संकट मंडराने लगा है। कभी निरंतर प्रवाहित रहने वाले अनेक प्राकृतिक गर्मजल कुंड जलस्रोत एक-एक कर सूखते जा रहे हैं। गंगा-यमुना, अनंत ऋषि, व्यास, मारकण्डेय ऋषि और गोदावरी आदि जैसे कुंडों के जलस्रोत पहले ही सूखकर इतिहास बन चुके हैं। अब विश्वविख्यात सप्तऋषि कुंड भी वेंटिलेटर पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। यह स्थिति न केवल पर्यावरणीय चिंता का विषय है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था और राजगीर की सांस्कृतिक पहचान पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है।सप्तऋषि कुंड के सात पवित्र झरनों में अगस्त मुनि और अत्रि मुनि के नाम वाले झरने पहले ही पूरी तरह जमींदोज हो चुके हैं। शेष पांच झरनों की स्थिति भी अत्यंत चिंताजनक है। विश्वामित्र मुनि और वशिष्ठ मुनि के नाम वाले झरने लगभग सूख चुके हैं, जबकि भारद्वाज मुनि, गौतम मुनि और जमदग्नि मुनि नाम के झरनों से अब केवल नाममात्र का जल प्रवाहित हो रहा है। इन झरनों से गिरने वाला पानी इतना कम हो गया है कि स्थानीय लोग इसकी तुलना ''आरो'' की पतली धार से कर रहे हैं। राजगीर का गर्मजल कुंड केवल प्राकृतिक आश्चर्य नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक रहा है। मान्यता है कि सप्तऋषियों की तपस्थली रहे इन कुंडों में स्नान करने से तन और मन दोनों की शुद्धि होती है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इन्हीं पवित्र जलधाराओं के दर्शन और स्नान के लिए भी राजगीर पहुंचते हैं। ऐसे में इन जलस्रोतों का लगातार सूखना पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और धार्मिक विरासत तीनों के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक जलधाराओं का समाप्त होना केवल मौसमी बदलाव का परिणाम नहीं हो सकता। इसके पीछे भूगर्भीय परिवर्तन, जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव, अतिक्रमण, अनियोजित निर्माण, भूगर्भीय जल का दोहन, जल निकासी के प्राकृतिक मार्गों में बाधा तथा पर्यावरणीय असंतुलन जैसे कई कारण हो सकते हैं। इन सभी पहलुओं की वैज्ञानिक जांच समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। नगर परिषद की सभापति जीरो देवी, समाजसेवी अशोक कुमार राय, जदयू जिला उपाध्यक्ष सुवेन्द्र राजवंशी, पूर्व प्रखण्ड प्रमुख सुधीर कुमार पटेल, वार्ड पार्षद डाॅ अनिल कुमार, केन्द्रीय पर्यटन सलाहकार डाॅ कौलेश कुमार एवं अन्य स्थानीय बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि अब भी प्रभावी पहल नहीं की गई तो आने वाली पीढ़ियां इन कुंडों और झरनों को केवल इतिहास और पुस्तकों में ही पढ़ सकेंगी। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की है कि भूगर्भीय वैज्ञानिकों, जल विशेषज्ञों, पुरातत्वविदों और पर्यावरण विशेषज्ञों की उच्चस्तरीय समिति गठित कर संपूर्ण क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण कराया जाय। जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन की ठोस कार्ययोजना बनाई जाय। राजगीर की यह धरोहर केवल बिहार की नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और प्रकृति की अमूल्य विरासत है। इसका संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक आस्था और उत्तरदायित्व का भी प्रश्न है। यदि समय रहते गंभीर और वैज्ञानिक प्रयास नहीं हुआ तो सप्तऋषि कुंड की पावन जलधाराएं भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जायेगी।

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Author: Ramvilas prasad

Published by: Janardan Pandey

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