Nalanda University : प्राचीन इतिहास के अनसुलझे रहस्यों को आधुनिक विज्ञान, आनुवंशिकी और बायोआर्कियोलॉजी की मदद से समझने की दिशा में मंगलवार को नालंदा यूनिवर्सिटी में राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया.
विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग ने भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला में देश के प्रमुख पुरातत्वविदों, मानवविज्ञानियों और आर्कियोजेनेटिक्स विशेषज्ञों को एक मंच पर लाया.
कार्यशाला का उद्घाटन नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया. उन्होंने मानव अतीत के अधिक सटीक और प्रमाणिक पुनर्निर्माण के लिए वैज्ञानिक एवं अंतर-विषयक दृष्टिकोण को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया.
उन्होंने कहा कि पुरातत्व अब केवल उत्खनन और प्राप्त अवशेषों के अध्ययन तक सीमित नहीं है. जीनोमिक इतिहास, आइसोटोपिक विश्लेषण, उन्नत सांख्यिकीय तकनीक और प्रयोगशाला आधारित अनुसंधान प्राचीन सभ्यताओं तथा मानव आबादी के इतिहास को नए सिरे से समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
कुलपति ने किया प्रयोगशाला सुविधाओं के विकास पर जोर
कुलपति ने डीएनए निष्कर्षण एवं शोधन, आइसोटोपिक विश्लेषण, कालानुक्रमिक पुनर्निर्माण तथा सांख्यिकीय पद्धतियों के उपयोग के लिए अत्याधुनिक प्रयोगशाला सुविधाओं के विकास पर जोर दिया. उन्होंने मानव जीनोम अध्ययन के क्षेत्र में ऑस्ट्रेलियाई अनुसंधान दल के साथ जारी सहयोग का भी उल्लेख किया.
उन्होंने कहा कि मानव जीनोमिक आंकड़ों के वैज्ञानिक अध्ययन से मानव जैविक विविधता, जनसांख्यिकीय इतिहास और प्राचीन प्रवास की प्रक्रियाओं को अधिक व्यापक दृष्टिकोण से समझने में मदद मिलेगी. प्रो. चतुर्वेदी ने इस अवसर पर नालंदा विश्वविद्यालय में पुरातत्व के क्षेत्र में एकीकृत एमए एवं डॉक्टरेट कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा भी की.
उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य उन्नत अंतर-विषयक अनुसंधान को संस्थागत आधार देना और पुरातत्व को आनुवंशिकी, मानवविज्ञान, जीवविज्ञान तथा अन्य वैज्ञानिक विषयों से जोड़कर शोध की नई संभावनाएं विकसित करना है.
कार्यशाला में कई प्रमुख हस्तियों और विशेषज्ञों की उपस्थिति
कार्यशाला में विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव जयदीप मजूमदार की विशेष उपस्थिति रही. मुख्य प्लेनरी सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने की. नालंदा विश्वविद्यालय के साथ-साथ सीएसआईआर भटनागर फेलो एवं सीसीएमबी, हैदराबाद से जुड़े विशेषज्ञ के रूप में आयोजन अध्यक्ष प्रो. वसंत शिंदे उपस्थित रहे.
नालंदा विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक अध्ययन स्कूल के डीन प्रो. गोदाबरीश मिश्र और पुरातत्व विभाग की समन्वयक एवं कार्यशाला संयोजक डॉ. एलोरा त्रिबेदी का भी कार्यक्रम में महत्वपूर्ण योगदान रहा.
ऐतिहासिक समुदायों और आनुवंशिकी पर विशेषज्ञों के विचार
भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक प्रो. बी.वी. शर्मा ने ऐतिहासिक समुदायों के अनुकूलन और उनके जीवन-परिस्थितियों को समझने में जैविक मानवविज्ञान एवं स्वास्थ्य अध्ययनों की भूमिका पर प्रकाश डाला.
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने दक्षिण एशियाई आबादी के इतिहास के पुनर्निर्माण में उन्नत जीनोमिक्स और प्राचीन डीएनए अनुसंधान के महत्व को रेखांकित किया.
तकनीकी सत्रों में वैज्ञानिकों ने साझा किए विचार
तकनीकी सत्रों में विश्वभारती, शांतिनिकेतन की डॉ. अभिशिक्ता घोष रॉय, बीआरआईसी-सीडीएफडी, हैदराबाद के एम.के. भान फेलो डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह तथा भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के भौतिक मानवविज्ञानी डॉ. मंजुलिका गौतम और डॉ. निंगोंबम समरजीत सिंह ने वैज्ञानिक विचार साझा किए.
कार्यशाला ने पुरातत्व, मानवविज्ञान और आर्कियोजेनेटिक्स के बीच सहयोग को नई दिशा देने के साथ भारत के प्राचीन अतीत के वैज्ञानिक पुनर्निर्माण की संभावनाओं को मजबूत किया.
