नालंदा प्रशासन में सात वर्षों से सामूहिक तबादला नहीं, कर्मचारियों के एक ही जगह तैनात रहने से बढ़ी गड़बड़ी की आशंका, पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट

Bihar Sharif News : 2019 के बाद सामूहिक स्थानांतरण नहीं, सरकारी कामकाज पर असर. नीचे पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट.

बिहारशरीफ से कंचन की रिपोर्ट
Bihar Sharif News : नालंदा जिला प्रशासन में पिछले सात वर्षों से कर्मचारियों का सामूहिक स्थानांतरण नहीं होने से प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. प्रखंड, अंचल, अनुमंडल कार्यालयों से लेकर पंचायत स्तर तक बड़ी संख्या में कर्मचारी वर्षों से एक ही स्थान पर कार्यरत हैं. प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक एक ही जगह पदस्थापना रहने से पारदर्शिता प्रभावित होती है और भ्रष्टाचार व स्थानीय स्तर पर सांठगांठ की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. जिले में वर्ष 2019 के बाद जिला स्तर पर किसी भी प्रकार का व्यापक सामूहिक स्थानांतरण अभियान नहीं चलाया गया. इसका असर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, कार्यालयों की कार्यप्रणाली और आम लोगों को मिलने वाली सेवाओं पर साफ दिखाई देने लगा है.

177 से अधिक शिकायतें, नालंदा में अनियमितताओं का बड़ा खुलासा

कई विभागों में वर्षों से जमे कर्मचारियों पर दलालों से मिलीभगत, लाभार्थियों से अवैध वसूली, फर्जी प्रमाण-पत्र निर्गत करने, योजनाओं में अनियमितता तथा सेवा देने में अनावश्यक विलंब जैसे आरोप लगातार सामने आ रहे हैं. स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीते वर्षों में जिला निगरानी विभाग को भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से संबंधित 177 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुई हैं. इनमें अधिकांश शिकायतें उन्हीं कार्यालयों से जुड़ी हैं, जहां कर्मचारी लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थापित हैं. आरटीपीएस, अंचल कार्यालय, प्रखंड कार्यालय तथा पंचायत स्तर पर दलालों की सक्रियता और घूसखोरी की शिकायतें भी लगातार सामने आती रही हैं.

2019 में हुआ था 617 कर्मचारियों का सामूहिक स्थानांतरण

नालंदा में अंतिम बार बड़े स्तर पर सामूहिक स्थानांतरण वर्ष 2019 में तत्कालीन जिलाधिकारी योगेंद्र सिंह के कार्यकाल में किया गया था. जिला स्थापना समिति की बैठक में लिए गए निर्णय के तहत विभिन्न विभागों के करीब 617 कर्मचारियों का स्थानांतरण किया गया था. उस समय आदेश जारी कर सभी स्थानांतरित कर्मियों को दो दिनों के भीतर नए पदस्थापन स्थल पर योगदान देने का निर्देश दिया गया था. उस सामूहिक स्थानांतरण में 29 कार्यपालक सहायक (आरटीपीएस), 89 लिपिक, 73 महिला पर्यवेक्षिका (आईसीडीएस), 36 राजस्व कर्मचारी, शिक्षा विभाग के 40 बीआरसी एवं बीआरपी, स्वास्थ्य विभाग के 87 संविदा कर्मी, पंचायती राज विभाग के 89 पंचायत सचिव, आईसीडीएस के 14 सांख्यिकी सहायक सहित अन्य विभागों के सैकड़ों कर्मचारियों का तबादला किया गया था.

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डीएम के स्थानांतरण के बाद ठप पड़ गई प्रक्रिया

तत्कालीन जिलाधिकारी के स्थानांतरण के बाद सामूहिक स्थानांतरण की प्रक्रिया लगभग ठप हो गई. सूत्रों के अनुसार वर्तमान में बीआरसी, बीआरपी, कार्यपालक सहायक, आवास सहायक, कृषि सलाहकार, बीएलओ, पीआरएस, प्रखंड सांख्यिकी पदाधिकारी, हल्का कर्मचारी सहित विभिन्न विभागों के सैकड़ों कर्मचारी वर्षों से एक ही स्थान पर कार्यरत हैं. प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि लंबे समय तक एक ही जगह तैनाती रहने से कर्मचारियों की स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों और बिचौलियों से नजदीकी बढ़ जाती है. इससे सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता प्रभावित होती है और भ्रष्टाचार की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाई नियमित तबादले की मांग

जिले के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, जागरूक नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने सरकार से स्थानांतरण नीति को सख्ती से लागू करने की मांग की है. सामाजिक कार्यकर्ता विकास कुमार उर्फ गांधी जी, विजय कुमार, पंकज कुमार और टिंकू कुमार का कहना है कि यदि नियमित अंतराल पर कर्मचारियों का स्थानांतरण किया जाए तो भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है. साथ ही सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी तथा आम लोगों को समय पर सेवाएं मिल सकेंगी.

प्रशासनिक व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

लगातार सात वर्षों से सामूहिक स्थानांतरण नहीं होने के कारण अब प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं. जानकारों का मानना है कि यदि समय-समय पर स्थानांतरण नीति लागू नहीं की गई तो भ्रष्टाचार, दलाली और सरकारी योजनाओं में अनियमितताओं पर प्रभावी नियंत्रण करना कठिन होगा. ऐसे में जिला प्रशासन से अपेक्षा की जा रही है कि लंबित स्थानांतरण प्रक्रिया को शीघ्र पूरा कर प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए.

पंचायत चुनाव से पहले वर्षों से जमे कर्मियों के तबादले की उठी मांग

जिले में इस वर्ष प्रस्तावित पंचायत चुनाव को लेकर प्रशासनिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं. आगामी चुनाव में मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, वार्ड सदस्य, पंच एवं अन्य जनप्रतिनिधियों का चुनाव होना है. ऐसे में क्षेत्र में वर्षों से पदस्थापित कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं. ग्रामीणों का कहना है कि कई निवर्तमान जनप्रतिनिधि अभी से अपने-अपने क्षेत्रों में कार्यरत कर्मियों के साथ तालमेल बनाकर विकास योजनाओं के क्रियान्वयन तथा समर्थकों के लंबित कार्यों को पूरा कराने में सक्रिय हो गए हैं. इससे निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है. ग्रामीण महेश राम, विवेकानंद पांडेय और अखलेश्वर पासवान का कहना है कि पंचायत चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे शुरू हो रही हैं. ऐसे समय में कई जनप्रतिनिधि अपने अनुकूल कार्य कराने का प्रयास कर रहे हैं. उनका कहना है कि चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने के लिए वर्षों से प्रखंड एवं पंचायत स्तर पर जमे कर्मचारियों का समय रहते स्थानांतरण किया जाना आवश्यक है. उनका मानना है कि इससे प्रशासनिक निष्पक्षता बनी रहेगी और चुनाव के दौरान किसी प्रकार के प्रभाव या पक्षपात की आशंका भी कम होगी.

क्या कहते हैं जिला स्थापना पदाधिकारी

इस संबंध में जिला स्थापना पदाधिकारी अभिषेक कुमार ने बताया कि प्रखंड एवं पंचायत स्तर पर कार्यरत कर्मियों के स्थानांतरण की प्रक्रिया संबंधित प्रखंड स्तर से संचालित की जाती है. जिला स्तर से केवल अनुशंसा की जाती है. उन्होंने कहा कि स्थानांतरण से संबंधित प्रस्ताव प्राप्त होने के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाती है.

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