Bihar news: बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए नीतीश सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है. कला, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री अरुण शंकर प्रसाद ने घोषणा की है कि मधुबनी के रांटी, दरभंगा के रैयाम, मुजफ्फरपुर के भूसरा और गया के थरकट्टी को नए ‘क्राफ्ट विलेज’ (शिल्पग्राम) के रूप में विकसित किया जाएगा.
बिहार के पहले शिल्पग्राम ‘जितवारपुर’ में विधिवत कामकाज शुरू होने के ऐतिहासिक मौके पर मंत्री ने यह जानकारी दी. इन गांवों को क्राफ्ट विलेज बनाने का प्रस्ताव जल्द ही केंद्र सरकार के वस्त्र मंत्रालय को भेजा जाएगा, जिससे न केवल स्थानीय कला को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि हजारों कलाकारों के लिए रोजगार के नए द्वार भी खुलेंगे.
चार गांव बनेंगे नए शिल्प और पर्यटन केंद्र
सरकार ने मधुबनी जिले के रांटी समेत दरभंगा के रैयाम, मुजफ्फरपुर के भूसरा और गया के थरकट्टी को नए क्राफ्ट विलेज के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है. मंत्री ने कहा कि ये सभी स्थान पारंपरिक कला, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत के लिहाज से समृद्ध हैं तथा शिल्पग्राम की आवश्यक शर्तों को पूरा करते हैं.
इसके लिए शीघ्र ही प्रस्ताव केंद्र सरकार के वस्त्र मंत्रालय को भेजा जाएगा, ताकि परियोजना को राष्ट्रीय स्तर का समर्थन मिल सके.
जितवारपुर से शुरू हुआ बिहार का पहला शिल्पग्राम मॉडल
इस घोषणा का अवसर मधुबनी जिले के मधुबनी स्थित जितवारपुर में आयोजित समारोह था, जहां बिहार के पहले शिल्पग्राम परियोजना का विधिवत कार्यारंभ हुआ. मंत्री ने कहा कि जितवारपुर न केवल मिथिला कला की पहचान है, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक भी है. उन्होंने विश्वास जताया कि यह परियोजना स्थानीय कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में मदद करेगी और क्षेत्र को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करेगी.
कलाकारों को मिलेगा बाजार और पहचान
बिहार म्युजियम के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि शिल्पग्राम मॉडल से कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने और बेचने के लिए स्थायी मंच मिलेगा. इससे स्थानीय हस्तशिल्प को प्रोत्साहन मिलेगा और युवा पीढ़ी भी पारंपरिक कला से जुड़ने के लिए प्रेरित होगी.
सरकार का मानना है कि जब कला, पर्यटन और बाजार को एक साथ जोड़ा जाएगा, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.
शिल्पग्राम केवल सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम नहीं होंगे, बल्कि यह स्थानीय विकास और पर्यटन विस्तार का भी मजबूत आधार बन सकते हैं. यदि योजनाएं समय पर लागू होती हैं, तो बिहार की पारंपरिक कला वैश्विक मंच पर नई पहचान बना सकती है.
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