मान और रूप से नहीं करें अहंकार

आरा : धन, मान, ज्ञान, बल और सुंदरता पाकर अहंकार नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने कर्तव्य का फल और ईश्वर की कृपा मान कर उसके प्रति नृलिप्त रहना चाहिए. अन्याय और अत्याचार से फलने-फूलने वाला व्यक्ति अधिक दिनों तक शांति से नहीं रह सकता. उपरोक्त बातें श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने चंदवा चातुर्मास ज्ञान […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | July 14, 2017 4:33 AM

आरा : धन, मान, ज्ञान, बल और सुंदरता पाकर अहंकार नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने कर्तव्य का फल और ईश्वर की कृपा मान कर उसके प्रति नृलिप्त रहना चाहिए. अन्याय और अत्याचार से फलने-फूलने वाला व्यक्ति अधिक दिनों तक शांति से नहीं रह सकता. उपरोक्त बातें श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने चंदवा चातुर्मास ज्ञान यज्ञ में प्रवचन करते हुए कही. श्री जीयर स्वामी ने कहा कि धन-वैभव, मान-सम्मान और सत्ता सुख प्राप्ति के बावजूद लिप्सा नहीं रखने वाला व्यक्ति ही महापुरुष कहलाता है.

सांसारिक उपलब्धियों से आशक्ति और अहंकार अंतत: विनाश का कारण बनता है. जो भी साधन-शक्ति प्राप्त हो, उसे ईश्वर की कृपा मान कर समाज के प्रति अपना दायित्व निर्वहन करना चाहिए. साधना के धनी के पास झुक जाते हैं साधन के धनी. इसलिए किसी भी क्षेत्र में साधन की अपेक्षा साधना पर ध्यान केंद्रित करनी चाहिए. स्वामी जी ने कहा कि महाभारत के कुछ दिनों उपरांत युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को बना दिया.

राजा परीक्षित से आज्ञा लेकर द्रौपदी सहित पांडव स्वर्गारोहण की यात्रा पर निकल गये. हरिद्वार से ऊपर देवभूमि और नीचे पृथ्वी माना गया है. स्वर्गारोहरण की यात्रा में सबसे पहले द्रौपदी बर्फ में गिर गयी. भीम कारण जानना चाहे तो धर्मराज ने बताया कि पांचों पांडव की पत्नी रहते हुए आशक्ति अर्जुन में थी. तत्पश्चात विद्याभिमानी सहदेव, रूप अभिमानी नकुल और गांडीव अभिमानी अर्जुन गिरे. अर्जुन को स्वयं तथा गांडीव पर भगवान से भी ज्यादा भरोसा था. उसके बाद भीम गिरे. अधिक भोजन करने वाला प्रमादी, आलसी व तामसी माना जाता है. युधिष्ठिर के साथ जा रहे कुत्ते को स्वर्ग द्वार पर रोका गया. युधिष्ठिर ने कहा कि कुत्ता नहीं गया तो मैं भी नहीं जाऊंगा. इनकी निष्ठा देख कुत्ता, देव रूप धर्म का शरीर धारण इन्हें धन्य कहा.