—एसएम कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में ””””बदलती लोक कलाएं और भारतीय संस्कृति”””” पर मंथन
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) के प्रभारी कुलपति प्रो बिमलेंदु शेखर झा ने कहा कि लोक कलाएं समाज का जीवंत दर्पण है. आज लोक कलाएं परंपरा और आधुनिकता के संगम पर खड़ी हैं. पहले जो कलाएं मिट्टी के बर्तनों और दीवारों तक सीमित थीं, वह अब फैशन स्टेटमेंट बन चुकी हैं और परिधानों, बैग्स व पर्स पर नजर आ रही हैं. उन्होंने कॉलेज की प्राचार्या द्वारा ””””विजुअल आर्ट्स विभाग”””” खोलने की मांग पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा, ””””आप बायलॉज बनाकर प्रस्ताव सिंडिकेट को भेजें, विश्वविद्यालय इसे राज्य सरकार को भेजेगा””””. ऐसे नेक कार्यों के लिए फंड की कोई कमी नहीं होगी. वे एसएम कॉलेज में ””””भारतीय संस्कृति में लोक कलाओं का बदलता स्वरूप”””” विषय पर शनिवार को दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे. कार्यक्रम का उद्घाटन प्रभारी कुलपति प्रो झा, मुख्य अतिथि प्रमंडलीय आयुक्त अवनीश कुमार सिंह और कॉलेज की प्राचार्या प्रो निशा झा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया. इस अवसर पर संगीत विभाग की छात्राओं ने कुलगीत और वेदगान की मधुर प्रस्तुति दी. इससे पहले पुष्प वर्षा से अतिथियों का स्वागत किया गया.मुख्य आकर्षण :
ग्लोबल सहभागिता : सेमिनार में भारत के अलावा यूएसए, श्रीलंका, मॉरीशस और नेपाल के विशेषज्ञ ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से जुड़े.बड़ी घोषणा : कुलपति ने विश्वविद्यालय में ””””विजुअल आर्ट्स डिपार्टमेंट”””” (दृश्य कला विभाग) खोलने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी.स्मारिका विमोचन : उद्घाटन सत्र के दौरान सेमिनार की विशेष स्मारिका का विमोचन किया गया.सांस्कृतिक संध्या : पहले दिन के अंत में छात्राओं द्वारा लोक कलाओं पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी गयी.
लोक कलाओं को आमलोगों से जोड़ना जरूरी : आयुक्त
प्रमंडलीय आयुक्त अवनीश कुमार सिंह ने विषय की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहा कि लोक कलाओं को लुप्त होने से बचाने के लिए इन्हें आम जनता से जोड़ना अनिवार्य है. उन्होंने कहा कि भारत के ””””विश्व गुरु”””” बनने के सपने में ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का बहुत बड़ा योगदान है. सेमिनार से निकलने वाले निष्कर्ष समाज और नीति-निर्धारकों के लिए उपयोगी साबित होंगे.
पहचान बचानी है, तो कलाकारों को देना होगा उचित मंच : प्राचार्या
एसएम कॉलेज की प्राचार्या व सेमिनार की कन्विनर प्रो निशा झा ने विषय प्रवेश कराते हुए लोक संगीत का वर्गीकरण पेश किया. उन्होंने पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि आज संगीत, सिनेमा और मूर्तिकला के स्तर में गिरावट आ रही है. उन्होंने सरकार और विश्वविद्यालय से मांग की कि कलाकारों को उचित मंच और संरक्षण दिया जाये, ताकि हमारी प्राचीन पहचान सुरक्षित रह सके.अकादमिक सत्र : विशेषज्ञों ने व्यक्त किया विचार
नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी से आयीं डॉ श्वेता दीप्ति ने भारतीय संस्कृति में लोक कला के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला. वहीं संस्कार भारती जौनपुर से आयीं डॉ ज्योति सिन्हा ने भोजपुरी लोक गीतों, मगध विश्वविद्यालय के डॉ नीरज कुमार ने साहित्य में लोक संस्कृति और सिक्किम यूनिवर्सिटी के डॉ संतोष कुमार ने पूर्वोत्तर भारत की सुषिर वाद्य परंपरा पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये. प्रयागराज की मधुरानी शुक्ला ने भारतीय लिखा संस्कृति पर विचार रखीं.
