– महर्षि मेंहीं आश्रम, कुप्पाघाट में पहुंचने लगे देशभर के सत्संगी
– अखिल भारतीय संतमत सतसंग महासभा की ओर से ठहरने, भोजन व अन्य मूलभूत सुविधा की हो रही है व्यवस्था
भागलपुर से दीपक राव की रिपोर्ट
महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज के महापरिनिर्वाण दिवस चार जून गुरुवार को महर्षि मेंहीं आश्रम, कुप्पाघाट समेत देश के विभिन्न स्थानों पर महर्षि संतसेवी महाराज के परिनिर्वाण दिवस पर विविध आयोजन होगा. इसे लेकर सारी तैयारी पूरी कर ली गयी है. इसे लेकर ध्यानाभ्यास, सत्संग, प्रवचन समाधि स्थल पर पुष्पांजलि सहित अन्य कार्यक्रम होंगे. अखिल भारतीय संतमत सत्संग महासभा की ओर से आयोजन को लेकर सारी व्यवस्था की गयी है. इतना ही नहीं देशभर के सत्संगियों का आना शुरू हाे गया है और साधकों को ध्यानाभ्यास कराया जा रहा है.
साधकों के बीच बांटा जायेगा विशेष प्रसादमहासभा के मंत्री राम कुमार ने बताया कि चार जून गुरुवार को महर्षि संतसेवी जी महाराज का परिनिर्वाण दिवस पर कुप्पाघाट में ध्यान-सत्संग, भजन कीर्तन, प्रवचन के बाद उनके समाधि स्थल पर सुबह सात बजे पुष्पांजलि एवं प्रसाद वितरण होगा. इस बार साधकों के लिए विशेष प्रसाद का वितरण होगा. इसमें फल व अंग वस्त्र रहेगा. बताया कि संतसेवी जी महाराज का जन्म सोमवार 20 दिसंबर 1920 में मधेपुरा जिले के ग्महरिया गांव में हुआ था. 1937 में मिड्ल की परीक्षा पास की. आश्रम परिसर में अखिल भारतीय संतमत सत्संग महासभा की ओर से आयोजन कराया जायेगा. विशेष भंडारा व फल का प्रसाद बांटा जायेगा. आश्रम के पंकज बाबा एवं संजय बाबा ने बताया कि दोपहर तीन बजे से मुख्य कार्यक्रम प्रारंभ होगा. इसमें स्तुति विनती ग्रंथ पाठ के बाद महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला जायेगा. कुप्पाघाट में संतसेवी जी महाराज की भव्य समाधि मंदिर में हजारों सत्संगी व श्रद्धालु माथा टेकेंगे.सद्गरु महर्षि मेंहीं महाराज महर्षि संतसेवी को मानते थे अपना मस्तिष्क
अखिल भारतीय संतमत सत्संग महासभा के महामंत्री दिव्य प्रकाश ने बताया कि महर्षि संतसेवी सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस महाराज के प्रमुख शिष्य में एक थे. महर्षि संतसेवी सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस महाराज के प्रमुख शिष्य में एक थे. इतना ही नहीं उन्हें अपना मस्तिष्क भी मानते थे. सद्गुरु के निधन के बाद महर्षि मेंहीं कुप्पाघाट आश्रम अंतर्गत संतमत के उत्तराधिकारी बने. महर्षि संतसेवी महाराज को मैट्रिक तक की भी डिग्री नहीं थी. केवल सातवीं तक ही पढ़ाई की. इसके बावजूद उनकी बुद्धि इतनी कुशाग्र थी कि कोई भी चीज तुरंत याद हो जाती. बड़े-बड़े विद्वान उनकी विद्वता का लोहा मानते थे. संतमत का देश-दुनिया में प्रचार-प्रसार में निभायी बड़ी भूमिका, ऋषिकेश में मिली महामंडलेश्वर की उपाधिमहामंत्री दिव्य प्रकाश ने बताया कि महर्षि संतसेवी ने कई पुस्तकों की रचना की. संतमत के देश-दुनिया में प्रचार-प्रसार में बड़ी भूमिका निभायी. अंग्रेजी भाषा समेत कई भाषाओं पर अच्छी पकड़ थी. महर्षि मेंहीं उन्हें अपना मस्तिष्क रूप में देखते थे. इनका जब पढ़ने का समय आया तो दुर्गा मध्य विद्यालय गम्हरिया में नाम लिखाया गया. पिता की मृत्यु के बाद दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण राजापुर गांव में पंडित लक्ष्मीकांत झा के घर जाकर उनके बच्चों को पढ़ाने लगे. यहां उन्हें वेद-पुराण व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन का मौका मिला. इसी क्रम में कनखुदिया में महर्षि मेंहीं परमहंस का आगमन हुआ और संतसेवी महाराज के मुलाकात हुई. 29 मार्च 1939 को महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज ने इनको मानस जप, मानस ध्यान और दृष्टि योग की दीक्षा दी. 86वें वार्षिक महाधिवेशन ऋषिकेश में मिली महर्षि की उपाधि 1970 में महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज ने दीक्षा देने का आदेश दिया. 86वें वार्षिक महाधिवेशन ऋषिकेश में इनको महामंडलेश्वर द्वारा महर्षि की उपाधि मिली. चार जून 2007 को संतसेवी महाराज ने निर्वाण प्राप्त किया.
