राघोपुर तटबंध पर करोड़ों पानी में बहे! 2007 की CAG रिपोर्ट में उठा था 10 करोड़ के नुकसान का सवाल, फिर 2026 में टूट गया बांध

भागलपुर के राघोपुर मार्जिनल बांध का टूटना सरकारी रकम की बर्बादी का जीता-जागता सबूत है. 2007 की CAG रिपोर्ट से लेकर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन सुरक्षा कागजों तक सीमित रही. 2026 में बांध टूटने से जल संसाधन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

भागलपुर जिले के खरीक प्रखंड स्थित काजीकोरैया-राघोपुर मार्जिनल बांध का टूटना कोई अचानक हुई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि वर्षों से चल रहे 'बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों' के नाम पर करोड़ों रुपये की सरकारी बर्बादी का जीता-जागता सबूत है. 24 अगस्त 2026 की रात जब गंगा के दबाव से बांध का 30 मीटर हिस्सा टूटा, तो उसने सिर्फ गांवों को नहीं डुबोया, बल्कि जल संसाधन विभाग की कार्यशैली की भी पोल खोल दी. 2007 की सीएजी (CAG) रिपोर्ट से लेकर अब तक के दस्तावेजों को खंगालने पर पता चलता है कि इस 6.50 किलोमीटर लंबे तटबंध को बचाने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए, लेकिन सुरक्षा कागजों तक ही सीमित रही.

2007: सीएजी (CAG) ने खोला था 10 करोड़ की बर्बादी का राज

सीएजी की 2007-08 की ऑडिट रिपोर्ट सबसे चौंकाने वाला सच बयान करती है:

  • योजना और खर्च: गंगा के बायें तट पर खैरपुर, राघोपुर और अकिदतपुर के पास कटाव रोकने के लिए 12.79 करोड़ रुपये की तकनीकी स्वीकृति दी गई. 10.08 करोड़ रुपये खर्च भी किए गए.
  • अधूरा काम और तबाही: 72 बोल्डर बेड बार बनाने थे, काम सिर्फ 63 पर शुरू हुआ और पूरे महज 36 हुए. जरूरी जियोटेक्सटाइल फिल्टर का काम भी अधूरा रहा. नतीजा, 2007 की बाढ़ में निर्मित सारी संरचनाएं बह गईं.
  • सीएजी की आपत्ति: सीएजी ने इस 10.08 करोड़ रुपये के खर्च को सीधे तौर पर 'नुकसान' माना और 55.89 लाख रुपये के 'अवॉयडेबल एक्सपेंडिचर' (ऐसा खर्च जिससे बचा जा सकता था) पर कड़े सवाल उठाए. विशेषज्ञ समिति ने 'बोल्डर रिवेटमेंट' की सिफारिश की थी, लेकिन विभाग ने मनमानी करते हुए 'बेड बार' बनवाए, जो टिक नहीं सके.

2008 से 2016 तक: करोड़ों के प्रोजेक्ट, पर स्थायी समाधान नहीं

2007 के बड़े नुकसान के बाद भी करोड़ों के ठेकों का खेल नहीं रुका:

  • 2008 में नया टेंडर: करोड़ों के काम के विफल होने के ठीक अगले साल, 18 मार्च 2008 को इसी क्षेत्र में एंटी-इरोशन (कटाव निरोधी) कार्य के लिए 18.77 करोड़ रुपये का नया एग्रीमेंट हुआ.
  • 2014 और 2015 की योजनाएं: रिकॉर्ड बताते हैं कि 2014 में करीब 67.99 करोड़ और 2015 में 65 करोड़ रुपये की लागत से कटाव निरोधी कार्य कराए गए.
  • 2016 का मेगा प्रोजेक्ट: इस्माइलपुर-बिंदटोली और राघोपुर क्षेत्र में कटाव रोकने के लिए लगभग 115 करोड़ रुपये की योजना धरातल पर उतारी गई.

2026 की तबाही: काम होता रहा और बांध टूट गया

वर्ष 2026 के मॉनसून में भी इसी बांध पर लगातार बचाव कार्य चलता रहा:

  • 26 जुलाई का कटाव: डी-नोज के समीप 110 मीटर में कटाव हुआ, जहां एनसी बेस, बंबू रोल और हाथी पांव जैसे बचाव कार्य किए गए.
  • 24 अगस्त की रात: तमाम करोड़ों के खर्च और बचाव दावों के बावजूद 24 अगस्त की रात करीब 2 बजे तेज कटाव के कारण 30 मीटर का हिस्सा टूट गया. अब इसे रोकने के लिए बालू भरे बोरे, जेसीबी और नावों का सहारा लिया जा रहा है.

सबसे बड़ा सवाल: कहां गया जनता का पैसा?

आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2007 में 10.08 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद सीएजी द्वारा 'नुकसान' बताए गए काम से लेकर आज तक जो अरबों रुपये खर्च हुए, उससे तटबंध को स्थायी सुरक्षा क्यों नहीं मिली?

यह स्थिति मांग करती है कि राज्य सरकार 2007 से लेकर 2026 तक काजीकोरैया-राघोपुर मार्जिनल बांध पर हुए हर कटाव निरोधी और बाढ़ संघर्षात्मक कार्य का 'वर्षवार व्हाइट पेपर' (श्वेत पत्र) सार्वजनिक करे—जिसमें प्रशासनिक स्वीकृति, वास्तविक भुगतान, एजेंसी का नाम और काम की वर्तमान स्थिति का पूरा सच जनता के सामने रखा जाए.


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By Vipin Thakur

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