नमन कुमार चौधरी, नाथनगर आम, अमरूद आदि फल के पौधे के बाद अब सब्जियों के पौधों की भी ग्राफ्टिंग (कलम) की जा रही है. इस तकनीक को इजराइल से कजरैली में आधुनिक खेती करनेवाले किसान सह पपीता मेन के नाम से मशहूर गुंजेश गुंजन लेकर आये हैं. गुंजेश भागलपुर प्रमंडलीय स्तर पर पहले किसान है, जिन्होंने यह तकनीक छतीसगढ़ के रायपुर से सिखा है. इस इजरायली तकनीक से सब्जियों के ग्राफ्टिंग (कलमी) कर तैयार किए गये पौधे का उम्र, उसका उत्पादन क्षमता, फसलों का साइज, रोग से लड़ने की क्षमता सीधे दोगुना व उससे भी ज्यादा है. इसलिए आधुनिक व बड़े पैमाने पर खेती करनेवाले किसानों के बीच इस तकनीक के पौधे का डिमांड अधिक है. गुंजेश ने बताया कि खासकर बैगन, टमाटर व सभी तरह के मिर्च में इजरायली तकनीक से ग्राफ्टिंग कर इसे अक्तूबर में 10 हजार पौधे को सफलतापूर्वक तैयार किया था. इसका सफलता दर 78% के करीब रहा. किसानों के मांगों को देखते हुए इसबार एक लाख पौधे तैयार किये जा रहे हैं, जिसमें 80 हजार बैगन व 20 हजार टमाटर के पौधे शामिल हैं. कैसे होता ग्राफ्टिंग गुंजेश के मुताबिक भीएनार नाम की कंपनी इस इजरायली टेक्नोलॉजी को लेकर भारत आया है. ये करीब 3-4 इंच ऊंचे पौधों में किया जाता है. ग्राफ्टिंग में पौधों का तना (ग्रासरूट) जंगली पौधा होता है, जो विशेष प्रकार का होता है तथा इसका विकास काफी ज्यादा होता है. एक ट्रे में इस जंगली पौधे को तैयार किया जाता है जबकि दूसरे ट्रे में बाजारों में मिलनेवाली बीज से पौधे को तैयार किया जाता है. गुंजेश ने बताया कि ग्राफ्टिंग के बाद पौधे का उम्र, उत्पादन क्षमता, वृद्धि व फसलों का साइज दोगुना से भी ज्यादा हो जाता है. बैगन में सबसे ज्यादा बीमारी बिल्ट का आता है, जिसमें जगह-जगह पौधे का जड़ सुखना शुरू हो जाता है, जबकि निमाटोड बीमारी में बैक्टीरिया जड़ में घुसकर गांठ बना लेता है. ग्राफ्टिंग के बाद पौधों में यह बीमारी न के बराबर लगती है. बताया कि पौधे का लंबाई 3-4 इंच होने के बाद जंगली पौधे का तना को जड़ से डेढ़-दो इंच ऊपर से धारदार ब्लेड से तिरछा काट दिया जाता है. उसी प्रकार दूसरे ट्रे में बीज से तैयार पौधे का ऊपरी पत्ती (डाल) के भाग को काटकर जंगली पौधे से सटा कर एक क्लिप लगा दिया जाता है. करीब एक सप्ताह में एक दूसरे में सेट होकर कलमी पौधा तैयार हो जाता है. तापमान व रौशनी का रखा जाता है ध्यान गुंजेश ने बताया कि इस तकनीक से पौधे विशेष प्रकार के शेड में तैयार होता है. इसके लिए तापमान औसतन 20 डिग्री से ज्यादा नहीं होना चाहिए. आद्रता ( हवा में जल की मात्रा) 80 % व लाइट कम यानि 3000-3500 लक्स होना आवश्यक है, जो बाहरी लाइट का मात्र 30% ही अंदर होनी चाहिए. इसके लिए जमीन से तीन फीट ऊंचा शेड बनाकर उसमें सूती कपड़ा डाला जाता है.
डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
