Bhagalpur New: सरकारी विभागों में फाइलों की रफ्तार को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन बिहार शिक्षा विभाग से जुड़ा यह मामला व्यवस्था की संवेदनशीलता पर ही सवाल खड़ा करता है. जिस अधिकारी कुमारी निर्मला का निधन 9 अगस्त 2024 को हो चुका था, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की फाइल करीब दो साल तक चलती रही.
विभाग को अधिकारी की मौत की जानकारी तब हुई, जब उनके पुत्र जितेंद्र कुमार ने अपनी मां का अवकाश स्वीकृत कराने के लिए आवेदन दिया और उसके साथ मृत्यु प्रमाणपत्र भी लगाया. इसके बाद शिक्षा विभाग ने 7 अगस्त 2026 को उनके खिलाफ चल रही अनुशासनिक कार्यवाही समाप्त करने का आदेश जारी किया.
यानी मौत के 728 दिन बाद विभाग ने उस अधिकारी की फाइल बंद की, जो इस दुनिया में ही नहीं थीं.
बेटे ने आवेदन नहीं दिया होता तो कब पता चलता?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है. अगर कुमारी निर्मला के पुत्र जितेंद्र कुमार अपनी मां का अवकाश स्वीकृत कराने के लिए विभाग में आवेदन नहीं देते और मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं लगाते, तो शिक्षा विभाग को उनकी मृत्यु की जानकारी कब मिलती?
विभागीय रिकॉर्ड में उनके खिलाफ गिरफ्तारी, निलंबन, आरोप पत्र, स्पष्टीकरण और जांच से संबंधित प्रक्रिया आगे बढ़ती रही. अलग-अलग समय पर अभिलेख और आपराधिक मामले की स्थिति भी मांगी गयी. लेकिन जिस अधिकारी के खिलाफ यह कार्रवाई चल रही थी, उनके निधन की सूचना विभागीय तंत्र तक नहीं पहुंच सकी.
यह सिर्फ एक फाइल के देर से बंद होने का मामला नहीं है. यह सरकारी व्यवस्था में रिकॉर्ड अपडेट, विभागीय समन्वय और जवाबदेही को लेकर बड़ा सवाल खड़ा करता है.
चेक बाउंस मामले के बाद हुई थी कार्रवाई
कुमारी निर्मला दरभंगा के माधोपट्टी स्थित प्रखंड शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में व्याख्याता थीं. वित्तीय लेन-देन से जुड़े एक मामले में उनके द्वारा जारी चेक के अनादर यानी बाउंस होने के बाद प्राथमिकी दर्ज हुई थी.
इसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया. वह 26 दिसंबर 2019 से 18 दिसंबर 2020 तक सहरसा जेल में रहीं. जमानत मिलने के बाद उन्हें निलंबित किया गया और बाद में दोबारा निलंबित किया गया.
इसके बाद 23 जुलाई 2021 को उन्हें निलंबन से मुक्त करते हुए भागलपुर के रंगराचौक में प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी के पद पर पदस्थापित किया गया.
रंगराचौक में पदस्थापन के बाद भी जारी रही जांच
रंगराचौक में बीइओ के रूप में पदस्थापन के बाद भी विभागीय मामला खत्म नहीं हुआ. आरोप पत्र तैयार किया गया, स्पष्टीकरण मांगा गया और अनुशासनिक कार्यवाही संचालित की गयी.
मामले की जांच करने वाले संचालन पदाधिकारी सह मुजफ्फरपुर के आरडीडीई की रिपोर्ट में कुमारी निर्मला के पक्ष में महत्वपूर्ण टिप्पणी की गयी. जांच में कहा गया कि आरोपी पदाधिकारी के विरुद्ध कोई विभागीय आरोप नहीं है और मामला निजी प्रकृति का है.
जांच पदाधिकारी ने उपलब्ध मंतव्य के आधार पर कुमारी निर्मला को आरोपमुक्त करने की अनुशंसा भी की.
आरोपमुक्ति की अनुशंसा के बाद भी फाइल चलती रही
आरोपमुक्ति की अनुशंसा के बावजूद विभागीय प्रक्रिया पूरी तरह खत्म नहीं हुई. शिक्षा विभाग ने जून 2023, फरवरी 2024 और मार्च 2024 में संबंधित अभिलेख तथा आपराधिक मामले की अद्यतन स्थिति मांगी.
यानी विभागीय स्तर पर मामला आगे बढ़ता रहा. इसी बीच 9 अगस्त 2024 को कुमारी निर्मला का निधन हो गया.
लेकिन विभागीय रिकॉर्ड में उनकी मृत्यु की सूचना दर्ज नहीं हुई.
एक तरफ उनकी जिंदगी खत्म हो चुकी थी, दूसरी तरफ सरकारी फाइल में उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रही. यही इस पूरे मामले का सबसे मानवीय और परेशान करने वाला पहलू है.
मौत के 728 दिन बाद बंद हुई फाइल
करीब दो साल बाद जब उनके पुत्र ने आवेदन के साथ मृत्यु प्रमाणपत्र विभाग को दिया, तब पूरे मामले की दिशा बदल गयी.
शिक्षा विभाग ने सामान्य प्रशासन विभाग के 18 जुलाई 2017 के पत्र का हवाला देते हुए माना कि किसी सरकारी सेवक की मृत्यु होने पर उसके खिलाफ चल रही विभागीय कार्यवाही समाप्त हो जाती है.
इसके बाद 7 अगस्त 2026 को कुमारी निर्मला के विरुद्ध चल रही अनुशासनिक कार्यवाही समाप्त कर फाइल बंद करने का आदेश जारी किया गया.
निलंबन अवधि का पूरा वेतन-भत्ता देने का आदेश
विभाग ने सिर्फ अनुशासनिक कार्यवाही समाप्त नहीं की, बल्कि बिहार सरकारी सेवक नियमावली, 2005 के तहत निलंबन अवधि का पूरा वेतन और भत्ता देने का भी आदेश दिया.
आदेश में कहा गया कि उन्हें उतना वेतन-भत्ता दिया जाये, जितना निलंबित नहीं होने की स्थिति में वह पाने की हकदार होतीं.
लेकिन इस आदेश के साथ इस पूरे मामले का सबसे मार्मिक पक्ष भी सामने आता है. जिस अधिकारी को यह राहत दी गयी, वह इस आदेश के करीब दो साल पहले ही दुनिया छोड़ चुकी थीं.
एक फाइल ने सरकारी व्यवस्था से पूछे कई सवाल
कुमारी निर्मला का मामला अब केवल एक विभागीय कार्रवाई की समाप्ति नहीं रह गया है. यह सवाल सरकारी कार्यालयों में कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड को अपडेट रखने की व्यवस्था पर भी है.
जब किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय और आपराधिक मामलों की स्थिति समय-समय पर मांगी जा सकती है, तो उसकी मृत्यु की सूचना विभाग तक क्यों नहीं पहुंची?
क्या विभागों के बीच ऐसा कोई प्रभावी तंत्र नहीं है, जिससे कर्मचारी की मृत्यु जैसी महत्वपूर्ण जानकारी समय पर संबंधित कार्यालय तक पहुंचे?
और सबसे अहम सवाल यह है कि अगर परिवार की ओर से आवेदन नहीं आता, तो यह फाइल आखिर कब बंद होती?
Bhagalpur New: परिवार को मिला कानूनी लाभ, लेकिन व्यवस्था को मिली चुनौती
विभाग के आदेश से निलंबन अवधि के वेतन-भत्ते को लेकर कुमारी निर्मला के परिवार को राहत मिलने का रास्ता साफ हुआ है. लेकिन इस पूरे प्रकरण ने सरकारी व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है.
एक अधिकारी की मौत के बाद भी 728 दिनों तक विभागीय कार्रवाई चलती रही. अंत में परिवार के आवेदन और मृत्यु प्रमाणपत्र के आधार पर विभाग को यह जानकारी मिली कि जिस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा रही थी, वह दो साल पहले ही दुनिया छोड़ चुकी थीं.
सरकारी फाइल आखिरकार बंद हो गयी, लेकिन 728 दिनों की यह देरी जवाबदेही और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर कई सवाल छोड़ गयी है.
