Bhagalpur News: भागलपुर की पहचान सिर्फ विक्रमशिला और अंग की ऐतिहासिक विरासत तक सीमित नहीं है. यहां की मंजूषा कला भी अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह मजबूत कर रही है. इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आयी है. मंजूषा कला के वरिष्ठ कलाकार एवं मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित को संसदीय स्थायी समिति के अध्ययन दौरे में सहभागिता के लिए आमंत्रित किया गया है.
यह अध्ययन दौरा 24 और 25 अगस्त 2026 को गया में प्रस्तावित है. उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज और संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से जारी आमंत्रण के अनुसार विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति परिवहन, पर्यटन एवं संस्कृति से जुड़े विषयों पर अध्ययन के लिए बिहार पहुंचेगी. इस दौरान राज्य की सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय और स्वदेशी कला तथा उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी ली जायेगी.
मंजूषा कला की आवाज पहुंचेगी महत्वपूर्ण मंच तक
मनोज कुमार पंडित को इस अध्ययन दौरे के लिए आमंत्रित किया जाना भागलपुर की मंजूषा कला के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है. संसदीय समिति के सामने स्थानीय लोककला से जुड़े कलाकार की मौजूदगी से अंग क्षेत्र की इस पारंपरिक कला को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा.
आमंत्रण पत्र में मनोज कुमार पंडित की मंजूषा चित्रकला और बिहार की लोक कला के क्षेत्र में विशेषज्ञता और लंबे अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्हें अध्ययन दौरे में सहभागिता के लिए नामित किया गया है.
यह सिर्फ एक कलाकार का सम्मान नहीं, बल्कि उस लोककला की पहचान से जुड़ा अवसर है, जिसे अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
लोकगाथा और संस्कृति को चित्रों में सहेजती है मंजूषा
मंजूषा कला को समझने के लिए इसे केवल रंगों और रेखाओं की चित्रकला के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है. इसके पीछे अंग क्षेत्र की लोकगाथाएं, परंपराएं और सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं.
मंजूषा चित्रों में बिहुला-विषहरी की लोकगाथा और उससे जुड़े सांस्कृतिक संदर्भों की झलक मिलती है. यही वजह है कि इस कला का संरक्षण केवल कलाकारों के कौशल को बचाना नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोकस्मृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी है.
वर्षों से संरक्षण और नयी पीढ़ी को प्रशिक्षण दे रहे मनोज पंडित
मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित लंबे समय से इस लोककला के संरक्षण और संवर्धन के लिए काम कर रहे हैं. उन्होंने प्रशिक्षण, प्रदर्शनियों और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से मंजूषा कला को अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया है.
उनके प्रयासों का एक महत्वपूर्ण पक्ष नयी पीढ़ी को मंजूषा कला से जोड़ना भी रहा है. पारंपरिक कला तभी जीवित रह सकती है, जब उसके कलाकारों के साथ-साथ उसे सीखने और आगे बढ़ाने वाली नयी पीढ़ी भी तैयार हो. प्रशिक्षण के माध्यम से इस दिशा में लगातार काम किया जा रहा है.
संसदीय समिति के सामने उठ सकते हैं संरक्षण से जुड़े सवाल
अध्ययन दौरे का उद्देश्य बिहार की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय तथा स्वदेशी कलाओं से जुड़े विषयों की जानकारी हासिल करना है. ऐसे में मंजूषा कला के प्रतिनिधि के रूप में मनोज पंडित की सहभागिता से इस कला के सामने मौजूद चुनौतियों और संभावनाओं पर चर्चा का अवसर मिल सकता है.
मंजूषा कलाकारों के लिए बाजार, प्रशिक्षण, प्रचार-प्रसार और नयी पीढ़ी को इससे जोड़ना महत्वपूर्ण विषय हैं. यदि पारंपरिक कलाकारों को संस्थागत सहयोग और व्यापक मंच मिलता है, तो लोककला को सांस्कृतिक पहचान के साथ आर्थिक अवसरों से भी जोड़ा जा सकता है.
Bhagalpur News: मनोज पंडित बोले, मंजूषा अंग की जीवंत विरासत
मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित ने कहा कि मंजूषा केवल एक चित्रकला नहीं है. यह अंग क्षेत्र की लोकगाथा, परंपरा, संस्कृति और पहचान से जुड़ी जीवंत विरासत है.
उन्होंने कहा कि संसदीय स्थायी समिति के अध्ययन दौरे में मंजूषा कला का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिलना इस लोककला के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
गया में होने वाला यह अध्ययन दौरा भले ही दो दिनों का हो, लेकिन भागलपुर की मंजूषा कला के लिए इसका महत्व इससे कहीं बड़ा है. राष्ट्रीय स्तर के मंच पर अंग की इस लोककला की विशेषज्ञ आवाज पहुंचना संरक्षण, पहचान और भविष्य की संभावनाओं के लिहाज से एक अहम कदम माना जा रहा है.
