मधेपुरा की चिंगारी से भड़का भागलपुर : टीएमबीयू में ''''सिंडिकेट वार'''', प्रभारी वीसी के समर्थन में उतरे समर्थक

टीएमबीयू व मधेपुर यूनिवर्सिटी.

— बीएनएमयू मधेपुरा के तीन अधिकारियों को पद से विमुक्त किये जाने के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरूबिहार के उच्च शिक्षा जगत में इन दिनों मधेपुरा और भागलपुर के बीच एक ऐसा ””””””””पावर गेम”””””””” शुरू हुआ है, जिसने विश्वविद्यालय की राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है. बीएनएमयू (मधेपुरा) के तीन बड़े अधिकारियों को राजभवन द्वारा विमुक्त किये जाने के बाद मधेपुरा का विवाद टीएमबीयू पहुंच गया है. यहां प्रभारी कुलपति प्रो विमलेंदु शेखर झा के पक्ष और विपक्ष में तलवारें खिंच गयी हैं. एक तरफ सिंडिकेट सदस्य कुलपति को ””ईमानदारी का मसीहा”” बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के संगीन आरोपों की झड़ी लग गयी है. यहां उल्लेखनीय है कि प्रो झा बीएनएमयू के स्थायी कुलपति हैं. वहां जिन तीन अधिकारियों को हटाया गया है, उनमें से एक टीएमबीयू से संबंद्ध हैं.

कुलपति के समर्थन में सिंडिकेट का ””सुरक्षा कवच””

टीएमबीयू के सिंडिकेट सदस्यों ने विश्वविद्यालय के ही एक वरीयतम शिक्षक के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कुलपति प्रो झा का पुरजोर बचाव किया है. सिंडिकेट सदस्य डॉ केके मंडल ने एक वीडियो वायरल मामले में सीधे शब्दों में कहा कि प्रो विमलेंदु शेखर झा एक निष्कलंक और ईमानदार व्यक्तित्व हैं. डॉ मंडल ने दावा किया कि जब से प्रो झा ने टीएमबीयू की कमान संभाली है, भ्रष्टाचार पर पूरी तरह नकेल कस दी गयी है. उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बरसों से बकाया पेंशनरों के पांच करोड़ रुपये का भुगतान करना उनकी कार्यकुशलता का प्रमाण है. इतना ही नहीं, उन्होंने एक वरीय शिक्षक के प्रमोशन को ही कठघरे में खड़ा कर दिया और विश्वविद्यालय प्रशासन से इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग कर डाली.

केके मंडल के सुर में मुश्फिक ने मिलाया सुर

इसी सुर में सुर मिलाते हुए सिंडिकेट सदस्य डॉ मुश्फिक आलम ने कहा कि 30 वर्षों के करियर में उन्होंने कई कुलपति देखे, लेकिन प्रो झा जैसा दूरदर्शी और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी विरला ही मिलता है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा, ””””””””जिन लोगों के निजी स्वार्थ की दुकानें बंद हो गयी हैं, वही आज बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं””””””””.

””चेक”” और ””चूक”” : पूर्व रजिस्ट्रार का पलटवारमधेपुरा के पूर्व रजिस्ट्रार और वरीय शिक्षक प्रो अशोक कुमार ठाकुर ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने इसे अपनी छवि धूमिल करने की साजिश बताया. प्रो ठाकुर ने स्पष्ट किया कि उनके आठ महीने के कार्यकाल में केवल 16 चेक कटे हैं. उन्होंने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा, ””नियम के मुताबिक रजिस्ट्रार को मात्र 10 हजार रुपये तक के चेक काटने का अधिकार है, जो पूरे बिहार में लागू है. मैंने कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया.”” उन्होंने समर्थ पोर्टल और यूएमआइएस (यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम) के विवाद को अपने इस्तीफे की मुख्य वजह बताया. उनके अनुसार, करोड़ों के खर्च वाले इस सिस्टम प्रोजेक्ट को लेकर उन पर भारी दबाव बनाया जा रहा था, जिसके कारण उन्होंने खुद पद छोड़ना बेहतर समझा.

विजन देखकर बनाया था, पहचानने में भूल हुई : प्रभारी कुलपति

विवाद पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए प्रभारी कुलपति प्रो विमलेंदु शेखर झा ने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, ””””””””मैंने विजन देखकर रजिस्ट्रार की नियुक्ति की थी, लेकिन शायद इंसान को पहचानने में मुझसे चूक हो गयी.”””””””” प्रो झा ने आरोप लगाया कि उनकी जानकारी के बिना कई 10-10 हजार के चेक तब काटे गये, जब वे मीटिंग के सिलसिले में पटना या भागलपुर में थे. उन्होंने एक और सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि मधेपुरा की ””””””””पैट”””””””” परीक्षा में एक अधिकारी के रिश्तेदार शामिल थे, लेकिन यह बात उनसे छिपाई गयी. जब छात्रों ने हंगामा किया, तब सच्चाई सामने आयी. कुलपति ने साफ किया कि लगातार मिल रही शिकायतों के कारण ही उन्होंने छह मार्च को राजभवन को नया पैनल भेजा था, जिसके बाद यह कार्रवाई हुई.

समर्थ पोर्टल बनाम यूएमआइएस : 3.5 करोड़ का ””खेला””?

इस पूरे विवाद में सबसे गंभीर आरोप दोनों विवि के सिंडिकेट सदस्य सह एमएलसी डॉ संजीव कुमार सिंह ने लगाये हैं. उन्होंने सीधे तौर पर ””””””””कमीशनखोरी”””””””” की बू आने की बात कही है. डॉ सिंह का आरोप है कि सरकार के ””””””””समर्थ पोर्टल”””””””” (जो कि निःशुल्क है) को किनारे कर यूएमआइएस नामक निजी एजेंसी को करोड़ों का लाभ पहुंचाया जा रहा है. डॉ संजीव ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा, ””””””””यूनिवर्सिटी में अधिकारियों की नियुक्तियां एजेंसी के प्रतिनिधि के इशारे पर हो रही हैं. यहां तक कि एजेंसी के लोगों को सरकारी आलीशान कमरे मुहैया कराए गए हैं.”””””””” उन्होंने साढ़े तीन करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन का जिक्र करते हुए सरकार से इस भुगतान को रोकने की अपील की है. साथ ही, उन्होंने एक साल से मधेपुरा विवि में सिंडिकेट की बैठक न होने को लेकर शिक्षा विभाग और राजभवन में शिकायत दर्ज कराने की बात कही है.

आगे क्या?

मधेपुरा से शुरू हुआ यह ””””””””टॉक बम”””””””” अब भागलपुर की राजनीति को दहला रहा है. एक तरफ ईमानदारी के दावे हैं, तो दूसरी तरफ करोड़ों के घोटाले की आशंका. क्या राजभवन इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराएगा? क्या यूएमआइएस और समर्थ पोर्टल की लड़ाई में छात्रों का भविष्य पिसेगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले दिनों में ही मिलेगा.

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By KALI KINKER MISHRA

KALI KINKER MISHRA is a contributor at Prabhat Khabar.

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