एकल परिवार और स्मार्टफोन की लत बिगाड़ रही बच्चों का मानसिक संतुलन: 33 में से 1 बच्चा ऑटिज्म से पीड़ित, डॉक्टरों ने दी बड़ी सलाह

हर 33 में से 1 बच्चा ऑटिज्म का शिकार. एकल परिवार और मोबाइल स्क्रीन की लत बच्चों के मानसिक विकास को कैसे प्रभावित कर रही है, जानिए डॉक्टर्स की सलाह.

Autism Symptoms in Kids: भागलपुर समेत बिहार के शहरी और कामकाजी परिवारों में एक खामोश बीमारी दबे पांव बच्चों के बचपन और उनके मानसिक विकास को लील रही है. आज के दौर में जहां पति-पत्नी दोनों नौकरीपेशा हैं और परिवार एकल यानी न्यूक्लियर हो चुके हैं, वहां मासूम बच्चों का सामाजिक दायरा सिमटकर चार दीवारों और मोबाइल स्क्रीन तक सीमित हो गया है. हालिया रिसर्च और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार, हर 33 में से एक बच्चा ऑटिज्म जैसे गंभीर न्यूरोडेवलपमेंटल विकार का शिकार हो रहा है. बच्चे का अचानक चुपचाप रहना, दूसरे बच्चों से घुलने-मिलने से कतराना या किसी से आंखें न मिलाना केवल उसका सीधापन नहीं, बल्कि ऑटिज्म का गंभीर लक्षण हो सकता है.

हर 33 में से एक बच्चा ऑटिज्म का शिकार, जानिए क्या है चिंता की वजह

भागलपुर स्थित जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज सह अस्पताल (जेएलएनएमसीएच) के शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ अंकुर प्रियदर्शी के अनुसार, ऑटिज्म का कोई एक निश्चित कारण नहीं है. हालांकि, एकल परिवारों और कामकाजी माता-पिता के बच्चों में सामाजिक संवाद की कमी और अकेलेपन के कारण इसके लक्षण तेजी से उभर रहे हैं. विशेषज्ञों ने साफ किया है कि एकल परिवार में रहना या माता-पिता का नौकरी करना ऑटिज्म का सीधा कारण नहीं है, लेकिन ऐसे माहौल में बच्चे को इंसानी संवाद और खेलकूद का पर्याप्त अवसर न मिलना इस समस्या को और गंभीर बना देता है.

2 से 3 साल की उम्र में दिखने लगते हैं लक्षण, भूलकर भी न करें नजरअंदाज

ऑटिज्म के संकेत आमतौर पर बच्चे के दो से तीन वर्ष की उम्र के आसपास स्पष्ट होने लगते हैं. अगर बच्चा अपने उम्र के दूसरे बच्चों के साथ खेलने या घुलने-मिलने में कोई रुचि नहीं दिखाता, नजरें मिलाने यानी आई कॉन्टैक्ट से बचता है या हमेशा अपनी ही दुनिया में खोया रहता है, तो अभिभावकों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए. इसके अलावा, एक ही काम या गतिविधि को बार-बार दोहराना, असामान्य चिड़चिड़ापन, सही से न बोल पाना, अचानक किसी खास आवाज से डर जाना और अजीब सी हरकतें करना ऑटिज्म के प्रमुख लक्षण हैं. इसे बच्चे की सामान्य आदत समझकर नजरअंदाज करना उसके भविष्य के लिए भारी पड़ सकता है.

मोबाइल स्क्रीन से दूरी और 'दादा-दादी का दुलार' है मानसिक विकास की संजीवनी

डॉ अंकुर प्रियदर्शी ने छोटे बच्चों को स्मार्टफोन और टीवी स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखने की सख्त सलाह दी है. उन्होंने कहा कि बच्चों को बंद कमरों में मोबाइल देने के बजाय खुले मैदानों में हमउम्र बच्चों के साथ खेलने का मौका मिलना चाहिए. बच्चे का मानसिक विकास तभी तेजी से होता है जब वह अधिक से अधिक लोगों के संपर्क में आता है. इसके लिए बच्चों को ग्रामीण परिवेश में ले जाना या घर में दादा-दादी और नाना-नानी के साथ रखना बेहद फायदेमंद साबित होता है. बुजुर्गों के दुलार, कहानियों और पारिवारिक माहौल में रहने से बच्चे की संवाद क्षमता और सामाजिक व्यवहार में अभूतपूर्व सुधार आता है.

दवाइयों की भूमिका सीमित, नियमित थेरेपी से ही सुधरेगी बच्चे की सेहत

चिकित्सकों के अनुसार ऑटिज्म की पहचान होते ही बच्चे की व्यक्तिगत जरूरत के हिसाब से विभिन्न थेरेपी शुरू कर दी जाती हैं. ऑटिज्म के इलाज में दवाइयों का रोल बेहद सीमित होता है, जबकि नियमित स्पीच थेरेपी, बिहेवियरल थेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपी से बच्चे की बातचीत करने की क्षमता और सामाजिक व्यवहार को सामान्य बनाया जा सकता है. इसके अलावा, ढाई या तीन साल की उम्र में बच्चों पर पढ़ाई और प्ले स्कूल का बेवजह दबाव डालने से बचना चाहिए. बच्चों को प्राकृतिक रूप से खेल-खेल में सीखने का मौका देना सबसे जरूरी है.

Autism Symptoms in Kids: मनोरोग विशेषज्ञ की सलाह: जितनी जल्दी होगी पहचान, उतना बेहतर होगा इलाज

प्रसिद्ध मनोरोग विशेषज्ञ डॉ पंकज कुमार मनस्वी ने बताया कि समाज में ऑटिज्म के प्रति जागरूकता की भारी कमी है. उन्होंने जोर देकर कहा कि तीन साल तक की उम्र में अगर बच्चे के व्यवहार में कोई भी असामान्य बदलाव दिखे, तो बिना देरी किए विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए. ऑटिज्म की जितनी जल्दी पहचान होगी, उतनी ही तत्परता से थेरेपी शुरू की जा सकेगी और बच्चे के मानसिक विकास को सही दिशा दी जा सकेगी. अभिभावकों की थोड़ी सी समझदारी और सही समय पर उठाया गया कदम मासूम के भविष्य को संवार सकता है.

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लेखक के बारे में

By प्रत्युष प्रशांत

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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