Bettaih : जिले में खिसकता गया वामदलों का जनाधार, लड़ाई से ही बाहर थे एक मात्र विधायक

चनपटिया विधान सभा से दो बार बीरबल शर्मा 1980-85 और 1995-2000 में भाकपा से विधायक बने थे.

– 80 के दशक में सिकटा, चनपटिया-नौतन में रहा है गढ़, अब सिकुड़ गया कैडर बेतिया . पश्चिम चंपारण की राजनीति में वामदल में विशेषकर भाकपा और भाकपा माले, कभी प्रभावशाली ताकत हुआ करती थी. चनपटिया और नौतन जैसे क्षेत्रों में भाकपा की पैठ इतनी मजबूत थी कि एक समय चुनावी समीकरण उ���के बिना अधूरे माने जाते थे. चनपटिया विधान सभा से दो बार बीरबल शर्मा 1980-85 और 1995-2000 में भाकपा से विधायक बने थे. दूसरे नौतन से एक बार रेवाकांत द्विवेदी ने 2000-2005 के विधानसभा में इन इलाकों का प्रतिनिधित्व किया. इन नेताओं ने वामदल की सियासी पकड़ को मजबूत पहचान दी थी. लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे यह पकड़ ढहती चली गई और अब हालात ऐसे हैं कि पार्टी के उम्मीदवार का प्रदर्शन महज जमानत बचाने तक सीमित होकर रह गया है. इतना ही नहीं 1967 से 1972 तक उमाशंकर शुक्ल सिकटा से वाम दल के विधायक बने थे. उन्होंने ही सिकटा में वामदल का प्लेटफार्म तैयार किया था. यह पुष्पित व पल्लवित होकर सिकटा विधानसभा में इसका ताज़ा उदाहरण देखने को मिला. पिछले विधानसभा चुनाव में यहां भाकपा माले के वीरेंद्र गुप्ता ने जोरदार तरीके से दस्तक दी थी. उनकी उम्मीदवारी ने पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर दी थी और कुछ हद तक विपक्षी समीकरणों को भी प्रभावित किया था. लेकिन इस बार न तो वह संघर्ष दिखा, न ही वैसा जनसमर्थन. नतीजतन, चुनावी मैदान में उतरने के बावजूद गुप्ता केवल अपनी जमानत बचाने की सीमा तक ही सिमट गए. यह परिणाम साफ संकेत देता है कि सिकटा जैसे क्षेत्रों में माले के जनाधार का क्षरण तेजी से हो रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि माले का कमजोर पड़ना सिर्फ किसी एक चुनाव का परिणाम नहीं, बल्कि पिछले एक दशक में लगातार बदलते राजनीतिक सामाजिक समीकरणों का असर है. नीतीश-मोदी फैक्टर, एनडीए की मजबूत संगठनात्मक जड़ें और स्थानीय स्तर पर विकास एवं सुशासन के मुद्दों की बढ़ती प्राथमिकता ने माले के पारंपरिक वोट बैंक को काफी हद तक खिसका दिया है. इसके अलावा युवा मतदाताओं का झुकाव राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुख्यधारा की पार्टियों की ओर बढ़ा है, जिससे माले जैसी विचारधारा-आधारित पार्टी को चुनौती और कठिन हो गई है. वामपंथी राजनीति का आधार हमेशा संघर्षों, किसान-मजदूर मुद्दों और स्थानीय जनाकांक्षाओं से जुड़ा रहा है, लेकिन बदलते दौर में इन मुद्दों को अन्य दलों ने भी अपने एजेंडे में शामिल कर लिया है. इससे माले की विशिष्टता कम हुई और उसका पारंपरिक समर्थन भी बिखरने लगा. सिकटा का ताज़ा परिणाम इसी गिरावट की पुष्टि करता है. जमानत बचाने भर तक सीमित यह प्रदर्शन माले के लिए चेतावनी भी है और चुनौती भी. यदि पार्टी को पश्चिम चंपारण में अपने पुराने अस्तित्व को फिर से खड़ा करना है, तो उसे नई रणनीति, नए नेतृत्व और बदलते राजनीतिक माहौल के अनुरूप स्वयं को ढालने की आवश्यकता होगी.

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Published by: Digvijay singh

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