इंटरनेट के दौर में खो रही गांव की पुरानी परंपरा, कभी गांव-गांव सजती थी झारा-झरखी की महफिल

ठकरा खेलते गांव के लडके | Prabhat Khabar Network

कभी सावन का महीना आते ही गांवों में झारा, झरखी, झरखा और ठकरा जैसे लोक नृत्य-संगीत की महफिलें सज जाती थीं, जिनमें पूरा गांव एक साथ आता था. आधुनिक मनोरंजन के साधनों के बढ़ते चलन के कारण ये पुरानी सांस्कृतिक परंपराएं अब सिमटती जा रही हैं.

बेतिया की संस्कृति: सावन का महीना शुरू होते ही कभी पश्चिम चंपारण के गांवों में झारा, झरखी, झरखा और ठकरा नामधारी लोक नृत्य-संगीत की महफिलें सज जाया करती थीं. लोकगीतों की मधुर धुन, पारंपरिक नृत्य और देर रात तक चलने वाली इन महफिलों में पूरा गांव शामिल होता था. यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने वाली परंपरा थी.

सावन में गांवों की शाम हो जाती थी खास

सावन की फुहारों के बीच गांव के लोग इन आयोजनों का पूरे साल इंतजार करते थे. शाम ढलते ही लोग एक जगह जुटने लगते और लोकगीतों की शुरुआत होती. झारा, झरखी, झरखा और ठकरा जैसे पारंपरिक नृत्य-संगीत ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा हुआ करते थे.

लोकगीतों में प्रेम, रिश्ते, सामाजिक जीवन और गांव की रोजमर्रा की संस्कृति की झलक मिलती थी. गीतों और नृत्य के बीच देर रात तक माहौल जीवंत रहता था.

उम्र और मजहब की नहीं थी कोई दीवार

इन लोक महफिलों की सबसे खास बात उनकी सामूहिकता थी. इनमें शामिल होने के लिए न उम्र की कोई सीमा थी और न ही मजहब की. बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं भी उत्साह के साथ आयोजन का हिस्सा बनते थे.

गांव के कम पढ़े-लिखे लोग भी इन आयोजनों के गीतों और परंपराओं से गहराई से जुड़े रहते थे. यही वजह थी कि सावन आते ही गांवों में एक अलग तरह की सामाजिक ऊर्जा दिखाई देती थी.

मनोरंजन के साथ सामाजिक मेलजोल का जरिया

झारा और झरखी जैसी परंपराएं ग्रामीण समाज में मेलजोल बढ़ाने का माध्यम भी थीं. लंबे समय तक एक-दूसरे से नहीं मिल पाने वाले लोग इन महफिलों में साथ बैठते थे. बातचीत, गीत-संगीत और सामूहिक भागीदारी से आपसी रिश्ते मजबूत होते थे.

ग्रामीण संस्कृति के जानकारों के अनुसार, ऐसे आयोजन लोगों को मानसिक सुकून भी देते थे. रोजमर्रा की परेशानियों के बीच लोकगीत और नृत्य सामूहिक खुशी का अवसर उपलब्ध कराते थे.

मोबाइल और आधुनिक मनोरंजन ने बदला गांव का रंग

समय के साथ गांवों का सामाजिक परिवेश तेजी से बदला है. मोबाइल फोन, इंटरनेट, टेलीविजन और मनोरंजन के नए साधनों ने लोगों के खाली समय को अपने तरीके से बदल दिया है. इसके साथ ही सामूहिक रूप से आयोजित होने वाली कई पारंपरिक महफिलें भी कम होती गयीं.

अब कभी पूरे गांव को एक साथ जोड़ने वाली झारा, झरखी, झरखा और ठकरा की परंपरा कुछ इलाकों तक ही सिमटकर रह गयी है.

नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी

ग्रामीण संस्कृति से जुड़े लोगों का कहना है कि ये परंपराएं सिर्फ बीते दौर की याद नहीं हैं. इनमें स्थानीय समाज की भाषा, संगीत, रिश्ते और जीवनशैली की कहानी छिपी है. इसलिए इन्हें संरक्षित करने और नई पीढ़ी को इनसे परिचित कराने की जरूरत है, ताकि आधुनिकता के बीच गांवों की यह सांस्कृतिक विरासत पूरी तरह खत्म न हो.

यह भी पढे़ं: बगहा में युवक की दिनदहाड़े हत्या, घर के दरवाजे पर फेंका शव


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By अवध किशोर तिवारी

अवध किशोर तिवारी तीन दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इन्होंने हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा के दिल्ली संस्करण से करियर की शुरुआत की. वर्तमान में वर्ष 2018 से प्रभात खबर के बेतिया ब्यूरो कार्यालय से जुड़े हैं. सामाजिक, अपराध, राजनीतिक एवं जनसरोकार से जुड़ी खबरों पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है

Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >