Bettiah News: करोड़ों के टेंडर और विकास योजनाओं पर सस्पेंस, नगर निगम में दो धड़ों के बीच जंग तेज

Bettiah News: नगर निगम की सशक्त स्थायी समिति चुनाव में महापौर विरोधी खेमे की बड़ी जीत. मेयर के पति और समर्थकों के दबदबे वाले समीकरण ध्वस्त, विकास योजनाओं पर टकराव बढ़ने की आशंका.जानिए खबर विस्तार से…

Bettiah News: बेतिया नगर निगम की अंदरूनी सियासत में शनिवार को एक ऐसा बड़ा और अप्रत्याशित उलटफेर देखने को मिला, जिसने निगम के भीतर के पूरे शक्ति समीकरण (पॉवर बैलेंस) को हिलाकर रख दिया है. शनिवार को संपन्न हुए सशक्त स्थायी समिति (निगम कैबिनेट) के हाई-प्रोफाइल चुनाव के जो परिणाम सामने आए हैं, उसने नगर निगम की भावी राजनीति की दिशा तय कर दी है. इस चुनाव ने न केवल सत्ता के केंद्र को बदल दिया है, बल्कि राजनीतिक जानकारों के अनुसार आने वाले दिनों में नगर निगम के भीतर प्रशासनिक और राजनीतिक खींचतान का एक नया अध्याय शुरू होने के संकेत दे दिए हैं.

अपनों को सेट करने की रणनीति फेल

नगर निगम के गलियारों से छनकर आ रही जानकारियों के अनुसार, इस चुनाव से पूर्व महापौर (मेयर) ने अपनी ताकत और वर्चस्व का इस्तेमाल करते हुए सशक्त स्थायी समिति में अपने चहेते समर्थक पार्षदों के साथ-साथ अपने पति (जो खुद भी नगर निगम में पार्षद हैं) को शामिल करा रखा था. मेयर खेमे को पूरी उम्मीद थी कि वे इस बार भी समिति पर अपना एकछत्र राज कायम रखने में कामयाब होंगे.

हालांकि, जब चुनाव के नतीजे सामने आए तो वे मेयर की अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत और चौंकाने वाले रहे. जिन पार्षदों को अब तक खुले तौर पर ‘महापौर विरोधी खेमे’ का माना जाता था और जो समय-समय पर नगर निगम प्रशासन की कार्यशैली व महापौर की नीतियों के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाते रहे थे, उन्हीं बागी और विरोधी पार्षदों ने एकजुटता दिखाते हुए सशक्त स्थायी समिति के सदस्य पद पर शानदार जीत दर्ज कर ली.

मेयर की स्थिति हुई कमजोर

इस राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक के बाद विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि सशक्त स्थायी समिति के नए गठन के बाद बेतिया नगर निगम में महापौर की स्थिति पहले की तुलना में बेहद कमजोर और रक्षात्मक हो गई है. गौरतलब है कि ‘सशक्त स्थायी समिति’ नगर निगम की सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली सर्वोच्च इकाई मानी जाती है.

  • वित्तीय स्वीकृतियां: शहर के करोड़ों रुपये के टेंडर और वित्तीय स्वीकृतियां इसी समिति की मुहर के बाद पास होती हैं.
  • प्रशासनिक निर्णय: निगम के बड़े प्रशासनिक फैसलों और नई योजनाओं के खाके पर इस समिति की अहम भूमिका होती है.
  • नया समीकरण: अब चूंकि समिति में विरोधियों का बहुमत या मजबूत दखल हो गया है, इसलिए मेयर के लिए अपनी मर्जी से कोई भी प्रस्ताव पास कराना लोहे के चने चबाने जैसा होगा.

राजनीति बढ़ने की आशंका

इस परिणाम के बाद बेतिया नगर निगम में अब दो स्पष्ट और शक्तिशाली खेमे उभरकर आमने-सामने आ गए हैं. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आने वाले समय में निगम बोर्ड की सामान्य बैठकों (बोर्ड मीटिंग) में विकास योजनाओं को लेकर गतिरोध और विरोध के स्वर और अधिक तीखे व मुखर हो सकते हैं. मेयर और स्थायी समिति के बीच होने वाले इस संभावित संभावित टकराव के कारण फाइलों के लटकने और निर्णय लेने की प्रक्रिया (डिसीजन मेकिंग) के बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

जनता को सता रही है योजनाओं के लटकने की चिंता

इस पूरे सियासी ड्रामे और शह-मात के खेल के बीच बेतिया नगर निगम क्षेत्र की आम जनता की सांसें अटकी हुई हैं. शहर के बुनियादी मुद्दे आज भी जस के तस बने हुए हैं:

  • जर्जर सड़कें: शहर की कई मुख्य और रिहायशी सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं.
  • जलजमाव का संकट: नालियों की नियमित और वैज्ञानिक तरीके से सफाई न होने के कारण हल्की बारिश में भी शहर डूब जाता है.
  • यातायात ठप: बाजारों में भीषण अतिक्रमण के कारण ट्रैफिक व्यवस्था लगातार दम तोड़ रही है.

ऐसे में स्थानीय नागरिकों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि बदले हुए इन राजनीतिक समीकरणों के बीच बेतिया के विकास कार्यों को रफ्तार मिलेगी या फिर हाल के दिनों में स्वीकृत हुई करोड़ों की योजनाएं इस आपसी खींचतान और ईगो-वॉर (अहंकार की लड़ाई) की भेंट चढ़ जाएंगी. स्थानीय नागरिकों का साफ कहना है कि पार्षदों की राजनीति चाहे जिस दिशा में जाए, लेकिन उनकी प्राथमिकता जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए. बहरहाल, अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बदले हुए शक्ति समीकरण बेतिया के विकास का कोई नया रास्ता खोलते हैं या फिर नगर निगम सियासी अखाड़े में तब्दील होता है.

बेतिया से अवध किशोर तिवारी की रिपोर्ट 

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Published by: Purushottam Kumar

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