Begusarai News: बेगूसराय ही नहीं बल्कि पूरे मिथिलांचल के कई जिलों के लिए प्रसिद्ध सिमरिया गंगा श्मशान घाट पर लाख कोशिशों के बाद भी स्थायी और सुचारू रूप से शवदाह की व्यवस्था बहाल नहीं की जा सकी है. प्रशासनिक नाकामी और लचर प्रबंधन के कारण यहाँ बने सरकारी प्रकल्प दम तोड़ रहे हैं, जिसका सीधा नतीजा यह है कि लोग आज भी खुले आसमान के नीचे पारंपरिक तरीके से शवों को जलाने के लिए विवश हैं. सरकार एक तरफ 'नमामि गंगे' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के माध्यम से गंगा नदी को पूरी तरह प्रदूषणमुक्त बनाने का दावा कर रही है, वहीं सिमरिया में करोड़ों की लागत से बना विद्युत शवदाह गृह और मुक्तिधाम उद्घाटन के बाद से ही बंद पड़ा है.
उद्घाटन के बाद ठनका गिरने से संयंत्र हुआ खराब
सिमरिया धाम में मुख्यमंत्री सात निश्चय-2 योजना के तहत लगभग 10 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से वर्ष 2023 में एक अत्याधुनिक शवदाह गृह का निर्माण कार्य शुरू किया गया था. इसके अंतर्गत दो विद्युत और चार बेड लकड़ी से संचालित होने वाले शवदाह गृह की व्यवस्था की गई थी. 7 मई 2026 को केंद्रीय मंत्री सह बेगूसराय के सांसद गिरिराज सिंह ने आधी-अधूरी तैयारियों के बीच आनन-फानन में इसका उद्घाटन किया था. उद्घाटन के बाद 9 मई को बेगूसराय रोटरी क्लब द्वारा एक लावारिस शव का अंतिम संस्कार भी कराया गया. लेकिन उसके ठीक बाद भारी बारिश के दौरान आकाशीय बिजली (ठनका) गिरने से शवदाह गृह का मुख्य ट्रांसफार्मर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और तकनीकी संयंत्रों में खराबी आ जाने के कारण यह पूरी तरह बंद हो गया.
लकड़ियों की कमी और बढ़ता गंगा प्रदूषण
सिमरिया गंगा घाट पर प्रतिदिन औसतन 50 से 60 शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है, जिसमें लगभग 400 मन लकड़ियों की खपत होती है. बाजार में महंगे दामों पर लकड़ी खरीदने को विवश लोग कई बार आर्थिक तंगी या जल्दबाजी के कारण अधजली अवस्था में ही शवों को गंगा नदी में प्रवाहित कर देते हैं. इस कारण पवित्र गंगा का जल लगातार प्रदूषित और दूषित होता जा रहा है. स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि इस नए शवदाह गृह के चालू होने से पर्यावरण स्वच्छ रहेगा और गंगा में गंदगी प्रवाहित नहीं होगी, लेकिन "प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः" (शुरुआत में ही विघ्न आना) वाली कहावत यहाँ पूरी तरह चरितार्थ हो गई है.
विवादों और पुल निर्माण की भेंट चढ़ीं पुरानी योजनाएं
यह पहली बार नहीं है जब सिमरिया में शवदाह गृह की योजना विफल हुई हो. वर्ष 2005 में पुराना विद्युत शवदाह गृह बंद होने के बाद, वर्ष 2011 में 49 लाख की लागत से छह बेडों वाले मुक्तिधाम का शिलान्यास तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने किया था. लेकिन स्थानीय वर्चस्व और आपसी प्रतिद्वंद्विता की लड़ाई में वह एक दिन भी नहीं चल सका और उसके कीमती सामान चोरी हो गए. इसके बाद वर्ष 2018 में सीएसआर योजना के तहत 16 लाख 43 हजार की राशि से पुनः मुक्तिधाम और 72 लाख की लागत से विद्युत शवदाह गृह का जीर्णोद्धार कराया गया. मगर गंगा नदी पर बन रहे सिक्स लेन पुल के रोड मैप में बाधक बनने के कारण इन दोनों संरचनाओं को पूरी तरह ध्वस्त (डिस्मेंटल) कर दिया गया था.
अब गैस आधारित आधुनिक शवदाह गृह का नया कंसेप्ट
इन तमाम विफलताओं के बीच अब सिमरिया गंगा घाट पर गैस आधारित आधुनिक शवदाह गृह के निर्माण का एक नया कंसेप्ट तैयार किया जा रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस नई और महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर नगर परिषद बीहट एवं ईशा फाउंडेशन के बीच एक आधिकारिक एकरारनामा (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं. इस परियोजना के सफल क्रियान्वयन के लिए सिमरिया क्षेत्र में लगभग 1.5 एकड़ भूमि उपलब्ध करायी जायेगी. प्रशासन का तर्क है कि यह नया गैस आधारित शवदाह गृह धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को अधिक सरल, पर्यावरण-अनुकूल और सम्मानजनक बनाएगा.
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