हर मनुष्य को अहंकार त्यागकर भक्तिमय जीवन जीना चाहिए : आचार्य मनोहर

महिपाटोल पंचायत के आदर्श ग्राम मोहब्बा में चल रहे श्रीमद्भागवत साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ कथा के तीसरे दिन श्रीमद्भागवत कथा सुनने को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी.

डंडारी. महिपाटोल पंचायत के आदर्श ग्राम मोहब्बा में चल रहे श्रीमद्भागवत साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ कथा के तीसरे दिन श्रीमद्भागवत कथा सुनने को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. वृंदावनधाम से आए सुप्रसिद्ध कथावाचक आचार्य मनोहर मिश्र जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन धुव्र चरित्र की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि महाराज उतानपाद जी की दो पत्नियां थी. जिसमें एक का नाम सुरुची और दुसरी का नाम सुनिती था. सुरुची को महाराज उतानपाद बहुत प्रेम करते थे एवं सुनिति के लिए एक अलग महल की व्यवस्था करवाया था. दास-दासी सहित सभी सुविधाएं सुनिति को प्रदान की गयी थी. जबकि राज्य सिंहासन पर महाराज के साथ बैठने का अधिकार सिर्फ सुरुचि को दिया गया था. कुछ समय बाद दोनों रानी से एक-एक सन्तान की प्राप्ति हुई. सुरुची का पुत्र उतम है एवं सुनिति का पुत्र ध्रुव हुए. इस कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं के बीच कथावाचक आचार्य मनोहर मिश्र जी महाराज ने कहा कि सुरुचि का अर्थ यानी रूचि पूर्वक अर्थात जो हमें पसंद हो वैसा जीवन जीने वाली बुद्धि एवं सुनिति यानी नीति आधारित धर्मपूर्वक जीवन जीने वाली बुद्धि. यही दो प्रकार की बुद्धि हर मनुष्य की दो पत्नी है. सुरुचि का संतान उत्तम एवं सुनिति का संतान ध्रुव जी महाराज हैं. जिसका तात्विक अर्थ बताते हुए कथावाचक ने कहा कि उत्तम का दो अर्थ होते हैं, व्यावहारिक भाषा में उतम का अर्थ अच्छा माना जाता है. परंतु व्याकरण के अनुसार उत में तम प्रत्यय लगने से उतम बनता है. और तम का एक अर्थ अंधकार भी होता है. उन्होंने कहा कि मनमाने तरीके से जीवन जीने वाले को अपना वर्तमान जीवन तो अच्छा लगता है. परन्तु उसका अंतिम परिणाम अंधकारमय होता है. ध्रुव का अर्थ सत्य होता है जो हमेशा सुखद हीं होता है. अत: सुनिती यानि निति पर चलते हुए अर्थात धर्म पर चलते हुए जीवन जीने वाले मनुष्य का जीवन सत्य यानी परमात्मा के राह पर चलने वाला होता है. जिसका अंतिम परिणाम सत्य यानी परमात्मा की प्राप्ति होती है. ध्रुव चरित्र का सारांश बताते हुए आचार्य मनोहर मिश्र जी महाराज ने मानव मात्र को धर्म के रास्ते पर, न्याय के रास्ते पर, सत्य के रास्ते पर चलते हुए भगवान श्रीराधा-माधव की प्राप्ति कर लेना बताया. यही हर मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य है. आचार्य ने यह भी बताया की मनमानी ढंग से जीवन जीने वाले का वर्तमान चाहे जितना भी अच्छा हो पर अंतिम परिणाम उसका अंधकारमय ही होता है. यानी उन्हें चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ता है. लेकिन धर्म की राह पर चलकर अपना जीवन जीने वाले मनुष्यों का वर्तमान जीवन भले कष्टकर दिखाई देता हो पर उसका अंतिम परिणाम बहुत ही सुखद है. उसे चौरासी लाख योनियों में नहीं भटकना पड़ता है. अत: हर मनुष्य को अहंकार त्यागकर भक्तिमय जीवन जीना चाहिए. हर मनुष्य को श्रीमद्भागवत की कथा जरूर सुननी चाहिए. कथावाचन के दौरान संगीत मंडली के सदस्य गंगाधाम, किशोर कुमार, कन्हैया कुमार, राजु कुमार, चंदन कुमार आदि के द्वारा आकर्षक भक्तिमय संगीत ने श्रद्धालुओं का मनमोह लिया.

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Published by: Amlesh prasad

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